पोषण करता है ये एकात्मता हुई। व्यवस्था को संस्कृति पोषण करता है, एकात्मता हुई। इस ढंग से ये round the wicket हो गया। क्या हो गया, कैसे गोल बन गया? है ना। ये देख लो कितना सही ढंग से वो एक दूसरे के लिए पूरक होने वाली बात स्पष्ट हुआ है, आप ही देख लो। ठीक है। इस आधार हम यदि सुखी होने का दिन को कल्पना कर सकते हैं, प्रयत्न कर सकते हैं, समझ सकते हैं, प्रमाणित कर सकते हैं। क्या हुआ? शुरुआत एक कल्पना से ही शुरू होगा ना, मनुष्य के पास कल्पना करने के तो औजार बना ही है, कोई आप तो fix करना नहीं है, factory में तैयार करना नहीं है। सभी में वो निहित है, जीवित है। उनमें एक कल्पना करने के लिए एक तो औजार हो गये, वो material हो गये। उसके बाद प्रयत्न कर सकता है, प्रयत्न करने के बाद समझ सकता है, समझने के बाद प्रमाणित कर सकता है, ऐसा लिखे हैं। ठीक किया है ये?
जिज्ञासा: आगे बाबा, धर्म नीति का आधार।
उत्तर: धर्म नीति का आधार, इसको थोड़ा सा अच्छी तरह से सुनिएगा, हाँ आगे, धर्म नीति का आधार।
जिज्ञासा: तन, मन तथा धन रूपी अर्थ के सदुपयोग हेतु व्यवस्था।
उत्तर: सदुपयोग कैसा मान जाए, उपयोग किसको माना जाए, प्रयोजनशील किसको माना जाए इसके बारे में आगे स्पष्ट किया है। परिवार में अपनी आवश्यकता के अनुसार उपयोग करता है, समाज में अखंड समाज में सदुपयोग करता है और सार्वभौम व्यवस्था में वो प्रयोजनशील होता है (तन, मन, धन)। परिवार में आवश्यकता से अधिक उत्पादन के बाद वस्तुओं का सदुपयोग करना स्वाभाविक होता है। ठीक है। संग्रह सुविधा विधि से, उत्पादन से कोई लेन-देन नहीं है, लाभ से मतलब है। लाभ काहे के लिए जरूरत है, सुविधा के लिए। मतलब ये संग्रह हो गया। सुविधा के लिए, संग्रह किया। संग्रह काहे के लिए पूछा, भोग के लिए, अति भोग के लिए बहु भोग के लिए। रास्ता खुला है। उसका प्रत्यक्ष प्रमाण क्या है- हॉलीवुड, बॉलीवुड, ‘गाली वुड’, तीन वुड आप जा करके देख लो। ठीक है, इस ढंग से मनुष्य जो है ना डूब चुका है बाबा। और उससे उद्धार होने के लिए प्रस्ताव है।
जिज्ञासा: आगे, राज्यनीति का आधार।
उत्तर: इसको सुना, धर्म नीति का आधार- तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग। सदुपयोग कैसा होता है? तो परिवार में उपयोग, अखंड समाज में सदुपयोग और सार्वभौम व्यवस्था में प्रयोजनशील।
जिज्ञासा: राज्यनीति के लिए तन, मन, धन रूपी अर्थ की सुरक्षा हेतु व्यवस्था।
उत्तर: सुरक्षा कैसा होता है, परिवार व्यवस्था एक, परिवार समूह व्यवस्था दो, ग्राम स्वराज व्यवस्था तीन, इसके अंदर चल करके दस सोपानीय व्यवस्था है, व्यवस्था में जीने से हम सुरक्षित रहते हैं। ग्राम परिवार व्यवस्था में जीते