प्रमाणित होने के बाद दिव्य चेतना, देव चेतना में बीज रूप में रहता ही है। और दिव्य चेतना प्रमाणित होने की व्यवस्था बना हुआ है। हर अवस्था के पीछे की अवस्था में उसका बीज रहता है, ये सिद्धांत है।
पदार्थावस्था में प्राणावस्था का बीज, प्राणावस्था में जीवावस्था का बीज, जीवावस्था में ज्ञानावस्था का बीज रखी हुई है। तभी प्रगट हुआ है। प्राकृतिक evidence है ये। जितने भी गवाही है, प्राकृतिक है ये।
जिज्ञासा: बाबाजी, मानव, देव मानव और दिव्य मानव इनको लक्षणों के आधार पर हम कैसे अलग कर पाएंगे, पहचान पाएंगे?
उत्तर: ये बहुत अच्छी ढंग से अलग-अलग नहीं है। प्रमाणित होना, समझ में आना, ये कैसा समझ में आता है। अलग करने की कोई चीज नहीं है, ‘है’ का समझ होना। तो जीव चेतना में हम जीते ही हैं। मानव जाति जीव चेतना में ही जी कर आया है। एक विधि से ईश्वरवादियों ने जीव चेतना को नकारने को कहा, और भौतिकवादियों ने जीव चेतना को पूजा करने के लिए कहा। इतने ही, एक दूसरे को गाली देते हुए आज चले आए हैं। अभी अपन कह रहे हैं, मानव, जीव चेतना से मानव चेतना में परिवर्तित होने की आवश्यकता है, फलस्वरूप अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था हाथ लगेगी। सार्वभौम व्यवस्था, अखंड समाज हाथ लगता है, अपना-पराया का दूरी, दीवार खत्म। सीमा सुरक्षा की पटरी खत्म, fission, fusion खत्म। क्या सुना? जितने भी अनिष्टकारी सोच हैं, उसकी खत्मी होना। जीव चेतना से मानव चेतना में यदि संक्रमित होना आ जाता है, जितने भी अनिष्ट सोच है वो खत्म। इसके लिए ये प्रस्ताव रखा है। इसमें अलग ना हो करके परिवर्तन होना हो गया ना, गुणात्मक परिवर्तन होना हो गया ना? गुणात्मक परिवर्तन हुआ मानव चेतना में। मानव चेतना में, देव चेतना में। मानव चेतना से देव चेतना में परिवर्तित होते हैं, उसमें इसमें क्या अंतर।
अभी इसमें क्या हुआ जितने भी राक्षसीयता, पाशवीयता, पशु जैसा से जीना, भोगवाद में, राक्षस जैसा जीना, भोग सहित दुष्टता में, भोग भी दुष्टता भी। पशु मानव केवल भोगवादी है, और राक्षस मानव भोगवादी भी है दुष्टता भी है। छीना-झपटी, सेंधमारी, जानमारी सब करना, ठीक है ना, ये बात आ गई। ये स्पष्ट होता है कि नहीं होता है? ये होने के बाद हम मानव चेतना में आते हैं, ये दोनों छूट जाते हैं। छुटते हैं तो क्या मिलता है? अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था मिलता है। उससे क्या हो जाता है? सारा सीमा सुरक्षा की झंझट समाप्त, माने युद्ध को युद्ध से रोको वाला खत्म, मानव चेतना में परिवर्तित होते ही, गलती खत्म, और अपराध तो बहुत दूर। गलती ही खत्म, खत्म हो जाना है। उसके बाद क्या हो सकता है पूछा। आगे चलकर के ये जितने भी अपना पराए के बीच में कांटा बोए हैं, वो धीरे-धीरे निकल करके अलग, विलय हो जाना है, खत्म हो जाना है। ये होने के पश्चात देव चेतना में हम पहुंचते हैं, तो निरामय किसी भी, कोई भी प्रकार की कोई बात ही नहीं है, जैसा तुम्हारे पास दो बच्चे हो गए, हमारे पास एक बच्चे हो गए ये भी सब दूरी खत्म। और केवल यश के आधार पर जीना बनता है। अपना पहचान बनाके रखेंगे, ऐसा रहेंगे, उपकार करेंगे। मनुष्य मानव चेतना से उपकार करना शुरू होता है वो पुष्ट होता है देव चेतना में, पूर्ण होता है दिव्य चेतना में। इतनी ही तो बात है। उपकार करना तो मानव चेतना से ही शुरू हो जाता है।