उपलब्धि को पहचान पाते हैं, फलस्वरूप अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था का सूत्र बनता है। इसका व्याख्या करने पर हम अखंड समाज भी पाते हैं, सार्वभौम व्यवस्था भी पाते हैं। ठीक है, और कोई बात?
जिज्ञासा: बाबा अभी आपने पूरा जो कुछ कहा, उसको एक शब्द में आप क्या कहना चाहेंगे?
उत्तर: हां एक वाक्य में यदि कहना चाहते हैं, तो ऐसा बनता है- मनुष्य जो है ना जागृत होना है जागृति को प्रमाणित करना है, यही बनता है। जागृति की रास्ता सुलभ है, और भ्रम का रास्ता कठिन है। क्या बात! जागृति के रास्ते में झूठ फ़रेब कुछ भी नहीं है। संकट कुछ भी नहीं है। कुल मिलाकर के भाषा ऐसा दिया जाए, केवल सुख के अलावा दूसरा कुछ होता ही नहीं। कुल मिलाकर के मानव को क्या होना है, समझदार होना है प्रमाणित करना है। जागृत होना है, प्रमाणित करना है। मानवीयता पूर्ण वैभव को प्रमाणित करना है। मानवीयता से परिपूर्ण होना है, प्रमाणित करना है। यही बनता है। कहीं भी कितना भी घूमेंगे उतना ही है। एक वाक्य में इतना ही।
जिज्ञासा: प्रमाणित होने का आशय स्वयं समझ जाना…
उत्तर: जीना, जीना [और दूसरे को समझा सकने में योग्य हो जाना] हाँ, वही तो ‘जीने देना जीना’। वही है, जी करके, जीने का प्रमाण में जीने देना। ठीक है। ये हम समझता हूं महाराज जी, निर्विवाद। एक बीज तो है, वृक्ष हो जाए तो बढ़िया है।
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