भाग – 5

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जिज्ञासा: बाबाजी, आपने लिखा है मैं नित्य, सत्य, शुद्ध एवं बुध परमात्मा रूपी व्यापक सत्ता में सम्पृक्त जड़ चैतन्य प्रकृति को अनुभव पूर्वक स्मरण करते हुए मानव व्यवहार दर्शन का विश्लेषण करता हूँ। इसका क्या आशय है? 

उत्तर: नित्य, शुद्ध, बुद्ध, परमात्मा का स्मरण करते हुए मानव व्यवहार दर्शन को विश्लेषण कर रहा हूँ। 

जिज्ञासा: ये नित्य, शुद्ध, बुद्ध इससे आपका क्या तात्पर्य है। 

उत्तर: नीचे लिखा है उसमें पूरा लिखा है। जैसे : नित्य का अर्थ है सदा-सदा जो विद्यमान है। सदा-सदा विद्यमान सत्ता स्वरुप में हो, ज़्यादा या कम न हो, और यहाँ ज़्यादा वहाँ कम वाला बात न हो, सर्वत्र एक सा विद्यमान हो, सर्वत्र एक सा भासमान हो, सर्वत्र एक सा सुखप्रद हो, निरंतर विद्यमान हो, ऐसे परमात्मा को स्मरण करते हुए मानव व्यवहार दर्शन को हम विश्लेषण करूँगा, यह प्रतिज्ञा किया। 

 

जिज्ञासा: आपने लिखा है- मानव ही दृष्टा पद प्रतिष्ठा में गण्य है। 

उत्तर: दूसरा सूत्र लिखा है, मानव ही अस्तित्व में एक ऐसा विशेष वस्तु है अथवा स्वाभाविक वस्तु है कि दृष्टा पद प्रतिष्ठा इन्ही में निहित है। इसके पहले अपने बुज़ुर्गों ने ईश्वर को दृष्टा बताया, कर्ता बताया, भोक्ता बताया। उसके बाद भोक्ता बताने में तकलीफ होने लगी, कुछ-कुछ करते रहे, किन्तु है ऐसा ही बात। तो मैंने पता लगाया, मुझको ये पता लगा कि जीवन ही दृष्टा, कर्ता और भोक्ता पद में होता है। क्या भोक्ता है जीवन- समाधान, समाधान को जीवन भोक्ता है। समस्या का दृष्टा हो जाता है, तब वो जीवन दुखी कहलाया। समस्या को भोक्ता नहीं है समस्या का दृष्टा बना रहता है उससे भ्रमित रहता है। भ्रमित जीवन, जागृत जीवन का पता लगा। जागृत जीवन और भ्रमित जीवन में क्या अंतर् हुआ भाई? अंतर इतना ही है, जीव चेतना विधि से शरीर को जीवन मानते हुए जीना माने भ्रम का अर्थ निकला, तात्पर्य निकला। मानव चेतना सहित देव चेतना पूर्वक जीना बन जाता है तो यह जागृति कहलाया। और जागृत जीवन स्वयं में दृष्टा पद प्रतिष्ठा में होता है ये लिखा है। माने समझदारी के स्थिति मे होता है, दृष्टा पद का मतलब समझा हुआ। जागृत जीवन का मतलब है प्रमाणित किया हुआ।

जिज्ञासा: बोल चाल मे ऐसा कहते हैं जैसी करनी वैसी भरनी।

उत्तर: जैसी करनी वैसी भरनी- ये सब कचरा कारखाने की भाषा है। इससे इसका लेन-देन नहीं है। जैसी करनी वैसी भरनी तो सब कर ही रहे हैं। ये कचरापंथी से लेन देन नहीं है। सीधा-सीधा मानव चेतना जागृति है और जीव चेतना भ्रम है। जीव चेतना में जीते हुए शरीर को जीवन मानते हैं, मानव चेतना मे जीते हुए जीवन को जीवन मानते हैं। जीवन को जीवन के स्वरूप मे पहचानने के बाद जीवन दृष्टा पद मे होता है। उसके पहले कोई ना कोई आरोप प्रत्यारोप मे

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