मरता ही रहता है। दिन में हजार बार मृत्यु को प्राप्त करता ही रहता है। शिकायत खान, जब तक शिकायत खान बना रहता है तब तक जीवन मरता ही रहता है। शिकायत से जिस दिन मुक्ति मिल गयी, और सदा सदा के लिए समाधान प्रस्तावित हो गया, उस दिन से जीना शुरू हुआ।
अभी क्या समझना है, दृष्टा पद का मतलब- समझदारी सम्पन्न जीवन। और जागृत जीवन का मतलब है- दृष्टा पद के बाद प्रमाणित किया हुआ जीवन, समझा हुआ और प्रमाणित किया हुआ। प्रमाण कहाँ प्रस्तुत करेगा- मानव परंपरा में प्रस्तुत करेगा। मानव परंपरा में कैसे प्रस्तुत करेगा- चारों अवस्थाओं के साथ जीता हुआ प्रमाणित करेगा। चारों अवस्थाओं में संतुलित रूप मे जीना जागृति का मतलब है, संगीतमय विधि से जीना। उसको सूत्र रूप में बताया- नियम, नियंत्रण, संतुलन न्यायपूर्वक जीना, ये जागृति का पहला चरण है उसके साथ समाधान जुड़ा तो हुआ दूसरा चरण, उसके साथ सहअस्तित्व जुड़ गया तीसरा चरण। इतना ही कुल मिला कर के गम्य स्थली है।
जिज्ञासा: व्यापक वस्तु अखंड और इकाइयां अनंत हैं।
उत्तर: व्यापक वस्तु अखंड रूप में अस्तित्व में है, सदा सदा के लिए नित्य, सत्य, शुद्ध, बुद्ध, परमात्मा जिसको नाम दिया। वो, ऐसे परमात्मा के स्वरुप में व्यापक वस्तु है। ऐसे वस्तु को ध्यान में रखते हुए सारे मानव व्यवहार दर्शन को लिखा है। ठीक किया कि गलत किया?
जिज्ञासा: व्यापक सत्ता अथवा परमात्मा जागृत मानव में, जागृत मानव से, जागृत मानव के लिए, कार्य व्यवहार काल में नियम के रूप में, विचार काल में समाधान के रूप में, अनुभव काल में आनंद के रूप में और आचरण काल में न्याय के रूप में प्राप्त है क्योंकि सत्ता में संपूर्ण प्रकृति विद्यमान है- यही सहअस्तित्व है। थोड़ा सा बताइए, बाबा।
उत्तर: व्यवहार काल में नियम के रूप में। नियम क्या है बताया- स्वधन, स्वनारी / स्वपुरुष, दया पूर्ण कार्य व्यवहार मानव का नियम है। माने जागृत मानव नियम पूर्वक जीने का प्रमाण - स्वधान, स्वनारी / स्वपुरुष एवं दयापूर्ण कार्य व्यवहार करते हुए मिलता है। ये जाग्रत मानव में पाए जाने वाले नियम हैं। भ्रमित मानव में पाए जाने वाली जो आचरण है उसको लिखा है- परधन, परनारी / परपुरुष, परपीड़ा के रूप में मिलता है।
विचार में यदि पूरा बात स्वधन, स्वनारी / स्वपुरुष दया पूर्ण कार्य व्यवहार को हम सोचेंगे, समाधान ही मिलता है समस्या मिलता ही नहीं।
वही अनुभव काल में देखेंगे, वो सहअस्तित्व में ही अनुभव होगा। आनंद के स्वरुप में ही, आनंद ही नाम दिया जा सकता है।
उसी विधि को आचरण काल में न्याय के रूप में, जब आचरण करते है उस समय में न्याय के रूप में मिलता है, आसानी से। इस प्रकार से मानव यदि सटीकता से जीता है तो व्यवहार काल में मानव नियम के रूप में ही जियेगा।
जिज्ञासा: इसी में आपने आगे लिखा है सत्ता में सम्पूर्ण प्रकृति विद्यमान है।