उत्तर: जैसे, विगत से आज तक हमको ‘यथार्थ है’ ये भनक पड़ा ही था। यथार्थ यदि भनक नहीं पड़ा होता तो हम यथार्थ के लिए खोज क्यों करते? यथार्थ कोई चीज़ है जो परंपरा में प्रमाणित नहीं है, इस रिक्तता को देख कर के जब हम घायल हुए, तभी तो हम इसे किये होंगे। तो यथार्थता की भनक आदि काल से ही आयी है। यथार्थ कोई चीज है, वास्तविकता कुछ है, सत्यता कुछ है, इस बात की भनक आदि काल से रही। क्योंकि शब्द तो अनादि काल से है, शब्द के अर्थ को आदमी ढूँढता ही रहा, सोचता ही रहा। हम ही सोच पाए ऐसा कुछ नहीं है। पहले भी कई लोग सोचे ही होंगे। कई तरीक़े से सोचे होंगे। हमारा कुछ ऐसा योग भोग था कि हम किसी विधि से ठीक ढंग से प्रस्तुत कर पाए, अभी लोगों को ऐसा लगता है, ये ठीक है।
जिज्ञासा: यथार्थ से आपका तात्पर्य क्या है?
उत्तर: जैसा जिसका अर्थ हो। अस्तित्व में चार अवस्था है। चारों अवस्था में अपने-अपने निश्चित आचरण को अर्थ बताया है। निश्चित अर्थ- चारों अवस्था में निश्चित आचरण।
पत्थर के आचरण में कोई किसी को शंका नहीं है, लोहे के आचरण में कोई किसी को शंका नहीं है। इतना लोहे का कारखाना बना है किसी कारखाना वाले को अभी तक किसी को लोहे के आचरण में शंका नहीं है। आगे कुछ हो जाये तो सोचेंगे। वनस्पतियों में, आम के आचरण में किसी को शंका नहीं, दूब के आचरण में किसी को शंका नहीं। और जीवों में गाय का आचरण में किसी को शंका नहीं, बाघ का आचरण में किसी को शंका नहीं, कुत्ते के आचरण में किसी को शंका नहीं और बिल्ली के आचरण में किसी को शंका नहीं। आप देख लीजिये, मनुष्य के पास आते हैं कितना विश्वास कर रहे हैं सोच लीजिये। कुल मिलकर इतना ही है। बाकि सब ठीक है, बहुत बढ़िया।
जिज्ञासा: बाबाजी, मनुष्य का खुद पर भी ये विश्वास नहीं बनता कि मैं अगले क्षण क्या करूंगा।
उत्तर: वही तो, वही तो बात कह रहे हैं। दूसरे के बारे बात क्या कहेंगे खुद के बारे में भी ऐसा नहीं हो पाता। ये क्या हो गया? इसमे क्या भांग घुल गया ये पूछा। ये सब तो ठीक है भाई मनुष्य को क्या हो गया रोग? तो नाम दिया 'भ्रम'। पहला मुद्दा भ्रम का हुआ- हम शरीर को जीवन मानते हैं। दूसरा- जीव चेतना को स्वीकारना, जीवों के सदृश्य जीना। हम अपने को जीव मान लेना। हमारे जितने भी सद्ग्रन्थ हैं हमको जीव के नाम से ही सम्बोधन किये हैं, सारा विश्व में। उसके बाद आया तीसरा- मानव परंपरा में हर व्यक्ति के पास कल्पनाशीलता, कर्म स्वतंत्रता का होना। ये तीन मुद्दा है। ये कल्पनाशीलता कर्मस्वतंत्रता विधी से हम कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं, माने कल्पना को अपने ढंग से करते ही हैं, इस ढंग से विविधता आ गयी। एक ही व्यक्ति में हज़ार व्यक्तित्व हो गए, उसमें हम परेशान हुए हैं। उसके बाद जैसे ही दूसरी विधि से आगे बढे, दूसरा विधी से आचरण की जगह मे, आचरण में हर व्यक्ति अपने आचरण को जीवो के आचरण से जोड़ लिया। जीवों में भी केवल विषयों से सम्बंधित बात को जोड़ा ‘उससे अच्छी हम जी रहा हूँ’ ऐसा छाती उभारा, इतना ही तो गति हुआ है अभी तक। [पशु से हम अच्छे हैं] उससे छूट ही नहीं पाए अब तक। उसमें भौतिकवाद बोला जीव चेतना को पूजा करो। भक्ति विरक्तिवाद इसको मृत्यु देने के लिए कहा। जीव चेतना में वही विषय प्रवृति को जीव चेतना माना। और जीव चेतना को पूरा का पूरा बातों में से फ़ैला नहीं पाये,