उत्तर: ये सब, ऐसा होने, के कारण क्या है ? सत्ता स्वयं ज्ञान स्वरुप है, जड़ प्रकृति में कार्य के रूप में सत्ता दिखाई पड़ती है, मानव में ज्ञान स्वरुप में सत्ता दिखाई पड़ती है। मानव भी ज्ञान में ही डूबा रहता है, तो इस ढंग से यदि हम अनुभव कर पाते हैं ऐसे स्थिति मे, तो हम हर हालत में सत्ता में ही जीता हुआ मिलेगा। सत्ता में जीते हैं माने ज्ञान में ही हम जी रहे हैं। ज्ञान में ही हम डूबे हैं भीगे हैं घिरे हुए हैं। सदा सदा के लिए हम ज्ञान में ही जी रहे हैं, यही जागृति का मतलब है, दृष्टा पद का मतलब है। 

जिज्ञासा: मानवतापूर्ण आचरण के बारे में आपने लिखा है- धीरता वीरता उदारता दया कृपा करुणा पूर्ण स्वभाव न्याय धर्म एवं सत्यता पूर्ण दृष्टि एवं वित्तेषणा, पुत्रेष्णा एवं लोकेषणात्मक प्रवृति से युक्त व्यवहार ही मानवीयता पूर्ण व्यवहार है। 

उत्तर: ये व्यवहार को बताया। मानवीयता पूर्ण व्यवहार क्या चीज़ है, आचरण क्या चीज़ है लिखा है। आचरण पूर्वक ही व्यवहार करेगा। आचरण में क्या-क्या स्थिति बनी? एक दृष्टि आ गयी, एक स्वाभाव आ गयी, एक प्रवृति आ गयी। दृष्टि में बताया- न्याय धर्म सत्य पूर्ण दृष्टि हो। हर बात को न्याय के साथ, न्याय सूत्र के साथ, धर्म अर्थात समाधान के साथ, सत्य- सहअस्तित्व के साथ जो सूत्र जुड़े हुए हैं, उसके साथ जोड़ करके हम यदि विचार करने योग्य होते हैं तो वह मानवीयता पूर्ण व्यवहार होता है। मानवीयता पूर्ण व्यवहार में दृष्टि, प्रवृति और स्वभाव तीन चीज़ आयी। जब हम ऐसा सोचने लगते हैं ये तीनो चीज़ आते हैं। क्या आते है उसमे न्याय धर्म और सत्य के रूप में दृष्टियां आते हैं उसी को हम तुलन कहते हैं। उसके बाद धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा, करुणा पूर्ण स्वाभाव होता है। पुत्रेष्णा, वित्तेषणा, लोकेषणा वादी प्रवृत्तियाँ होते हैं, ये लिखा है। इस प्रकार के हम यदि आचरण करते हैं उसको मानवीयता पूर्ण आचरण नाम दिया। उसके बाद दूसरे विधि से बताया मूल्य, चरित्र नैतिकता। संबंधों को पहचानना, मूल्यों का निर्वाह करना, मूल्याङ्कन करना उभय तृप्ति पाना, उसके बाद स्वधन, स्वनारी / स्वपुरुष, दयापूर्ण कार्यव्यवहार करना, उसके बाद तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग सुरक्षा करना। ये तीनों आने से मानवीयता पूर्ण आचरण करना बनता है। ये दोनों विधि से लिखा हुआ है। 

जिज्ञासा: सहअस्तित्व में अनुभव ही ज्ञान का उद्घाटन है, सहअस्तित्व में अनुभव में, अनुभव से, अनुभव के लिए अध्ययन है। ज्ञान ही विवेक एवं विज्ञान रूप में प्रमाण है। यही ज्ञानावस्था में मानव सहज मौलिकता है। 

उत्तर: मानव सहज मौलिकता क्या चीज है बताया? हमारा पूरा का पूरा सहअस्तित्व में अध्ययन, सहअस्तित्व में अनुभव, सहअस्तित्व में आचरण। तीन बात बताया। आचरण करने से मानवीयता कहलाता है, अनुभव करने से दृष्टा पद कहलाया, प्रमाण कहलाया, अनुभव होने से तो विचार करने से समाधान हो गया। इस ढंग से हम हर अवस्था में हम जागृति को प्रमाणित करने योग्य होते हैं। 

जिज्ञासा: कृतज्ञता के बारे में आपने लिखा है 'कृतज्ञता पूर्वक उन सुपथ प्रदर्शकों की वंदना करता हूँ जिनसे यथार्थता के स्रोत आज भी जीवित हैं।

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