विषयों को तो माना ये जीवों का विषय। ये वैदिक विचार यहाँ तक पहुँचा। किन्तु उसको त्यागने को बोला, उसको सर्वथा नाश करने के लिए बोला, उसी को विरक्ति माना, उसी को भक्ति माना। तो भक्ति विरक्ति व्यक्ति में कैसा हुआ हो इसको हम कहीं भी पहचान नहीं पाते हैं। किंतु भक्ति विरक्ति का कोई परंपरा हुआ हो शिक्षा के रूप में, व्यवस्था के रूप में, संविधान के रूप में, आचरण के रूप में, इन चारों भाग का एक संगीतमय वस्तु भक्ति विरक्ति से मिला नहीं। भक्ति के नाम से बहुत किया और विरक्ति के नाम से भी बहुत किया किन्तु ये बात मिला नहीं, मानव को मिला नहीं। इस ढंग से हम भक्ति विरक्ति के आधार पर परंपरा बना नहीं पाए, न परिवार बना पाए और न ही समाज बना पाए। इस ढंग से बात बनी।
इसके बाद आया कि कैसा बनेगा परंपरा, बोले जैसा आदमी है वैसे बनेगा। आदमी कैसा है पूछा तो पचहत्तर टुकड़े में जीता है आदमी, यहाँ आ गए हम। अब एक टुकड़ा अच्छा भी हो सकता है बाकी खराब भी हो सकता है। मानव को जो दो गद्दी मिली : धर्म गद्दी और राज गद्दी। राजगद्दी में आदमी को गलती करने वाला और अपराध करने वाला मान लिया, उसके लिए संहिता लिखा है। धर्म गद्दी ने मानव को पापी, अज्ञानी, स्वार्थी माना उसके लिए अपना कार्यक्रम बना कर रखा है। इसको क्या किया जाये? इतनी ही तो गति ही हुआ है अभी तक। इसी को धर्म गद्दी और कुछ आगे extend किया ईश्वर के प्रति आस्था पैदा किया जाये, उपासना के प्रति आस्था पैदा किया जाये, आराधना के प्रति आस्था पैदा किया जाये। ये सब किया। जितना किया जो समुदाय, वो उतना ही वहां युद्ध का झगड़े का जड़ बन गया। अभी जितना भी झगड़े का जड़ है वो धर्म गद्दियाँ ज़्यादा है। राज गद्दियों में भ्रष्टाचार, धर्म गद्दियों में झगड़े का बीज।
जिज्ञासा: बाबाजी, एक और प्रश्न मेरे मन में उठ रहा है, कि जितनी अव्यवस्था फ़ैल रही है आज संसार में, मानव ध्यान भक्ति की तरफ भी जा रहा है, इधर मंदिरों में आस्था की तरफ मानव ज़्यादा झुकता हुआ दिख रहा है, एक तरफ अनैतिकता, अव्यवस्था दिख रही है तो दूसरी तरफ धार्मिकता भी दिख रही है।
उत्तर: ऐसा आपका कहना है, दिख रही है, मगर रहता नहीं है। दिखावा में ऐसा लगता है। जैसा आप और हम गए मंदिर में, हम एक तोला सोना चढ़ा दिया, हम बड़ा आस्थावान हो गया, मंदिर में निष्ठा हो गयी। हमने भी अपने को बड़ा आस्थावान माना और मंदिर वाला भी मान लिया क्योंकि हमने सोना दे दिया। हम पैसे नहीं दिया, हमको मंदिर नहीं मानता है कि हम मंदिर के परस्त हैं। पैसे से हम पहचानने लगे आस्था को, धार्मिकता को। पैसे से धार्मिकता है या नहीं है, वो बात को परिशीलन करने के बाद आयी। अभी इतने लोग बैठे हैं, पैसे से कोई धर्म हो तो बताओ।
जिज्ञासा: यदि ऐसा सूत्र होता तो जिसके पास जितना पैसा वो उसको उड़ेला देता, उतना धार्मिक होता।
उत्तर: उड़ेला भी है, कई लोगों ने आखिरी दाना तक लुटा दिया। कहाँ क्या चीज हो गई? कुछ नहीं हुआ। बल्कि ये निकला कि और कहीं छुपाया होगा, खोजो। यहाँ पहुंचे लोग। ये सब बात को हम इतिहास में सुन चुके हैं, अब इतना ही सोचना है कि पैसे से धर्म होता है कि नहीं होता है। यदि धर्म होता है तो किससे होता है उसको trace करने की बात है। तो पता चला ये पैसे से कुछ नहीं होता है समाधान से धर्म, समाधान से सुख। मानव धर्म- सुख। सुखी होने