के लिए समाधान चाहिए। देखिये अरब रुपए रखे रहें, इससे समाधान नहीं है, सुखी होना नहीं है। एक आदमी के पास एक भी पैसा न हो पर समाधान संपन्न हो वो सुखी होने का दावा कर सकता है। बात ऐसा हुआ। इसके आधार पर हम क्या किए? एक छोटा सा युक्ति निकाल लिए है। समझदारी से समाधान आता है, मानव धर्म सफल होता है। श्रम से समृद्धि होता है। समाधान और समृद्धि पूर्वक मानव परंपरा, सुख, शांति पूर्वक जी पाता है। आदिकाल से अमन चैन का आश्वासन है, राजगद्दी सुख, शांति का आश्वासन दिया है। राजगद्दी जिस दिन से शुरू हुआ, उस तारीख से वो आज तक प्रमाणित नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ? न राजा के पास कोई समाधान, न राजा के गुरु महाराज के पास कोई समाधान। राजा है तो गुरु महाराज होना ही है क्योंकि राजा को introduce करना के लिए गुरु महाराज ही है। गुरु महाराज ही कहा कि राजा ईश्वर का अवतार है, वसु का स्वरूप है, इनकी आज्ञा पालन करना हमारा कर्त्तव्य है। हो गया, खतम हो गई बात। ये लिखा हुआ है हमारे documents में। अब इसको क्या करोगे बताओ? इस ढंग से न तो हमको ये प्रमाण मिला राजा ने सब बात का समाधान दिया हो ऐसा भी नहीं मिला, न राजा के गुरु महाराज लोग दिए हों ऐसा भी नहीं मिला।
तो पहले प्रायश्चित की बात शुरू किया राजगद्दी में , फिर वो दंड के रूप में परिवर्तित हुआ, वही यंत्रणा के रूप में परिवर्तित हुआ। इस ढंग से राजगद्दी परंपरा चली। और धर्म गद्दी परंपरा उस ढंग से चली कि पापी को तारना है, अज्ञानी को ज्ञानी बनाना है। स्वार्थी को परमार्थी बनाना है। परमार्थी बनाना है किसको? जिसके पास दो चार पैसा हो। वो परमार्थी होगा। तो क्या होगा, गुरु महाराज को देगा। उसका मकसद ही इतना है। अब गुरु महाराज को इस प्रकार से दिया, गुरु महाराज के पास पूरा पैसा हो गया। वो पैसे को यदि स्वार्थ माना जाये तो गुरु महाराज से अधिक स्वार्थी कौन हुआ। इस ढंग से यदि हम परमुखापेक्ष से किसी को जोड़ते हैं वो धर्म होने वाला नहीं है। यहाँ आ गए हम, यहाँ आने के पश्चात स्वार्थी को परमार्थी बनाना गड़बड़ हो गया। इसके बाद पापी को तारना- उसके लिए पहले दक्षिणा लाओ। पहले दक्षिणा दो बाद में हम पवित्र जल डालेंगे। क्या बात ! अच्छा गंगा बह रही है। गंगा जी में जाकर के आदमी स्नान करता है वो गंगा जल नहीं है, वो पंडा जी डालने से ही गंगा जल है। इस विधि को क्या करोगे आप बताओ? इस ढंग से क्या होगा। और अज्ञानी को ज्ञानी बनाना, शंकर जी से पार्वती जी सुने, पार्वती जी से नारद सुने, नारद से वशिष्ट सुने, वशिष्ट जी से अंगिरा सुने, उससे वो ऋषि सुने, वो ऋषि सुने, हम आपको बता रहे हैं मैं इनसे सुना उनसे सुना, हम आपको बता रहे हैं, हमारा दक्षिणा दो।
अभी क्या है सूचना प्रौद्योगिकी। आपको सूचना दिया ना पैसा दो। ये कह ही रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी में यही ना करते हो? वही हम लोग पहले कर चुके हैं, हमने उनका कान में बताया राम। वैसे तो हर दिन हल्ला करते ही रहते हैं राम राम, हम उनका कान में बोल दिया- गुरु मन्त्र दिया न, दक्षिणा दो। कान में बोलने से गुरुमंत्र है, हल्ला करने से गुरुमंत्र नहीं हुआ। इस ढंग से हम उजड़े हैं, अपने आप में अपने गले की फांसी बना के रखे हैं। इस ढंग से बहुत सारे कुछ practice में आये। सारे practice का अंत में यही है- कोई यथार्थ है यह सूचना हमको दिए हैं उसके लिए हम कृतज्ञ हैं। सत्यता है, इस बात की सूचना दिए, इसके लिए हम कृतज्ञ हैं। ये घोषणा किया है। आज भी जीवित कहिए, सूचना रूप में, हम जीवित हैं इसके लिए हम कृतज्ञ है। ये लिखा, ठीक किया?