जिज्ञासा: आगे लिखा है- कृतज्ञता के बिना गौरवता, गौरवता के बिना सरलता, सरलता के बिना सहजता, सहजता के बिना मानवीयता, मानवीयता के बिना सहअस्तित्व तथा सहअस्तित्व के बिना कृतज्ञता सिद्ध नहीं होती। 

उत्तर: यह कितना शुद्ध बात है आप सोच लीजिये। यह पूरा का पूरा जहाँ से शुरू पुनः वहाँ जलेबी आ गई। तो ये जो है शुरुआत कहाँ से किया? कृतज्ञता के बिना गौरवता- कृतज्ञता का मतलब है- जो हमारे उपकार होने के लिए सूचना मिली, सहायता मिली दोनों लिखा है। हमारे उत्थान के लिए, जागृति के लिए कुछ भी सहायता मिली उसकी स्वीकृति = कृतज्ञता। उसका जो परिभाषा बनता है "कृतं येन ज्ञायते इति सा कृतज्ञता"। इस प्रकार से उसका play होती है, शब्द का। उसका अर्थ ये ही है जिस किसी से भी हमको यथार्थता के लिए, वास्तविकता के लिए, सत्यता के लिए सहायता मिली रहती है, , उसको स्वीकार करना कृतज्ञता है, अस्वीकार करना कृतघ्नता है।यदि कृतज्ञता ना हो , कृतघ्नता के साथ हम परंपरा को नहीं बनाएंगे। कभी भी नहीं बनायेंगे। अभी बीच में वो भी हुआ है, अपने इतिहास को यदि ठीक से अध्ययन करेंगे, बहुत सारे जगह हम ठीक हो सकते थे हुए नहीं। हमने छः दर्शनों का अध्ययन किया है। उन दर्शनों के अनुसार कई ऐसी जगह है, मुद्दा है, जो आदमी अपने को पहचानने के योग्य था किन्तु किया नहीं। उसका कारण क्या है- कृतज्ञता व्यक्त नहीं किए। कृतज्ञ नहीं हुए। स्वयं से कुछ निकला नहीं, ख़तम हो गयी बात सारी बात पूरा हो गई। कृतज्ञ होना एक बहुत आवश्यकता था। 

अब गौरवता क्या है- हमारे ध्यान में हमसे श्रेष्ठ होना स्वीकार हो गया, इसका नाम है- गौरव। आगे उसका स्पष्टीकरण क्या है- उनके जैसा होने के लिए तृष्णा, होने के लिए प्यास, होने के लिए प्रयास। इतना चीज़ एकत्रित होने से हम किसी का गौरव किया, इसका प्रमाण है। अब उनके जैसे, जिसको हमसे श्रेष्ठ माना उसके जैसा होने के लिए हमारे में प्रयत्न शुरू हो जाता है, हम कहीं न कहीं पहुंचेंगे क्योंकि हमारे पास भी वही कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता है, जो पहले जिनके पास था वही हमारे पास भी है। तो हम कृतज्ञता को व्यक्त किये बिना गौरव आएगा ही नहीं।

जिज्ञासा: सरलता के बिना सहजता लिखा है, सरलता और सहजता में क्या अंतर है? 

उत्तर: सरलता में, सहजता में ये चीज़ है, तो एक आदमी के पास सरलता, सहजता। सहजता जो की हमारा स्वत्व हो गया है। सरलता वो चीज़ है हम स्वत्व बनाने जा रहे हैं। हम अपने में स्वत्व के रूप में पा चुके हैं वो सहजता है, स्वत्व बनाये जा रहे हैं वो सरलता है। सहजता में यदि सत्यता आ गयी सहजता हो गयी। सत्यता के बिना कोई सहजता होता नहीं। हम सहजता से व्यक्त हो रहे हैं मतलब हम सत्यता से संपन्न हैं। सहजता के बिना मानवीयता व्यक्त होना ही नहीं। हम अपने में यदि स्वत्व संपन्न नहीं होंगे तो मानवीयता नहीं होगी, स्वत्व क्या है- ज्ञान। ज्ञानावस्था में ज्ञान ही सहजता है। ज्ञान होने के बाद ही मानवीयता होती है। ज्ञान के पहले मानवीयता होती नहीं। ज्ञान के बारे में अभी तक यही माना गया, बीसवीं शताब्दी तक यही माना गया पाँच ज्ञानेन्द्रियों का ज्ञान होना ज्ञान है, जो जीवों में भी है।

जिज्ञासा: ज्ञानेन्द्रियों का तो निग्रह करने वाली बात भी कई जगह में है।

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