भाग – 6

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जिज्ञासा: गुरु मूल्यन की ओर गति को आपने उत्थान कहा है? 

उत्तर: गुणात्मक परिवर्तन में उत्थान-पतन की बात आती है, मात्रात्मक परिवर्तन में उन्नति-अवनति की बात आती है।

जिज्ञासा: बाबा प्रश्न ये  है कि पुस्तक में उन्नति की परिभाषा में लिखा है कि गुरु मूल्यन की ओर अथवा समाधान की ओर प्रगति ही उन्नति है। 

उत्तर: ठीक है न, माने सभी बात समाधान के साथ तो जुड़ना ही है। समाधान समृद्धि, दो बात किया, समृद्धि को सदुपयोग करने पर समृद्धि का मतलब निकलती है, अपव्यय करने पर समृद्धि होती ही नहीं। तो समृद्धि से संबंधित बात कहा है उन्नति के बारे में। 

जिज्ञासा: सम्पूर्ण पदार्थ अपनी परमाण्विक स्थिति में सचेष्ट है। इसलिए यह स्पष्ट होता है कि उन्हें ऊर्जा प्राप्त है यह निरपेक्ष ऊर्जा है। तर्क रूप में यदि कोई पूछे, कि यह जो ऊर्जा है यह उस इकाई का ही कोई गुण क्यों नहीं है? 

उत्तर: उसको पता लगाना पड़ेगा न भाई। इकाई का ऊर्जा दूसरे तक कैसे पहुँचा, इकाई अपने में ज़्यादा ऊर्जा को कैसे दिया? ये सब बात आपको बताना पड़ेगा। स्वयं में क्रियाशील भी हो दूसरों को क्रियाशील करा सके, वैसा बात आ जाये। उसके बारे में सोचा जा सकता है। अभी ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है। हम जितने भी ऊर्जा प्राप्त करते हैं, उससे ज़्यादा वस्तु को हम बर्बाद करने के बाद ही थोड़ा ऊर्जा प्राप्त करते हैं, सापेक्ष ऊर्जा को। हम जितना गर्म करते हैं पानी को और उस पानी से कोई यंत्र चलाते हैं [ वाष्प से], तो जितना हम कोयला जलाते हैं, उस कोयले का जो ऊष्मा है, उसको ऊर्जा में परिवर्तित करने से जितना ऊर्जा मिलना चाहिए उससे कम मिलता है। इसका मतलब ये हुआ कि कोई भी भौतिक वस्तुएं अपने से अधिक ऊर्जान्वित होकर दूसरे को दे नहीं पाते हैं। ये बात समझ में आता है, ये गवाही है। आपके सामने रखा हुआ है, इसमें कोई पर्दा नहीं लगा है। 

यदि मान भी लिया तो उससे क्या कल्याण होगा? उससे क्या कल्याण करना चाहते हो? उद्देश्य के बिना कुछ होगा? कुछ भी बोलना बनता है फिर। उद्देश्य के बिना यदि बात करने के लिए इजाजत है, अपन कुछ भी बोल सकते हैं। 

जिज्ञासा: उद्देश्य के बिना की बात नहीं है बाबा, एक चीज को हमने निरपेक्ष ऊर्जा कहा है?

उत्तर: ठीक है सापेक्ष कहना है, किस लिए, वो पहले बताओ ना भाई। निरपेक्ष ऊर्जा इसलिए बेटा - perineal स्रोत है। आप क्या कहना चाहते हो?

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