जिज्ञासा: मेरा ये प्रश्न है कि ये इकाई का ही कोई गुण नहीं हो सकता ऐसा हम सिद्ध कर रहे हैं।
उत्तर: यदि आप ऐसा कहते हो, ये तो गवाही बता दिया। इकाई से जो कुछ भी निष्पन्न होकर के दूसरे को मिलता है वो जितना lose करता है उससे कम ही मिलता है। ये तो बात बता दिया, उसके बाद कैसा इसको जोड़ोगे बताओ ना।
अभी जितनी भी बात कह रहे हैं, मनुष्य में आकर के, वस्तु में हो कर के जितना वो वस्तु है उससे ज़्यादा ताकत है, वो कहाँ से आया उसको बताया।
जिज्ञासा: ये ज़्यादा ताकत किस रूप में कह रहे हैं बाबा आप?
उत्तर: वो कितना भी use करता है, उतना रहता ही है। जैसे- एक परमाणु कितना भी हज़ार वर्ष घूमा उससे जितना fatigue होना था वो न होकर के वो यथावत रहता है। इसलिए बताया perennial स्रोत है। इतनी ही बात है।
ये क्यों बताया? हमने संसार को व्यवस्था के रूप में देखा। व्यवस्था के रूप में इसको व्यक्त करना ज़रूरी माना। भौतिकवादी के अनुसार अव्यवस्था को शुरू किया, तो ये(आदर्शवाद) वाले ने माया को बताया, इन दोनों से तो कोई व्यवस्था बनने वाला नहीं है। हमने व्यवस्था के रूप में अस्तित्व को देखा उसको हमने प्रकट किया है।
जिज्ञासा: बाबा मूल चेष्टा क्या है?
उत्तर: मूल चेष्टा यानि क्रिया शीलता, ऊर्जा सम्पन्नता का फलन में क्रियाशीलता लिखा है, उस पर ध्यान देने की ज़रुरत है। यह मूल चेष्टा है। क्रियाशीलता ही श्रम गति परिणाम के रूप में व्याख्यायित है। श्रम का विश्राम, गति का गंतव्य, परिणाम का अमरत्व, विकास और जागृति का मतलब, अस्तित्व में जो कुछ भी क्रिया है उसका अर्थ है इतना ही है। उसको अध्ययन करना है जीना है। वहाँ पहुंचना है कि नहीं, उसको तय करिये। नहीं पहुंचना है तो अभी जो कर रहे हैं वो ठीक है। जीना है तो इसको अध्ययन करना ही पड़ेगा।
जिज्ञासा: बाबा मूल चेष्टा हर इकाई में होती है या सिर्फ परमाणु में?
उत्तर: हाँ परमाणु में है। परमाणु ही है तीनों क्रियाकलाप के मूल में, लिखा है। जीवन क्रिया के मूल में भी परमाणु है, भौतिक क्रिया के मूल में भी परमाणु है, रासायनिक क्रिया के मूल में भी परमाणु है। तीन ही प्रजाति की क्रिया है अस्तित्व में। चौथे प्रजाति की अस्तित्व में कोई क्रिया नहीं है। भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया, जीवन क्रिया तीनों के मूल में परमाणु ही है।
जिज्ञासा: बाबा धरती की गति को क्या मूल चेष्टा नहीं कहेंगे क्या, या फिर कहेंगे सभी परमाणुओं की सम्मिलित मूल चेष्टा है?