हो या कोई gain होता हो, दोनो ही नहीं होता। अभी वो loss and gain के लिए जा कर के सबका गला कट गये। प्रकाश में गति बता करके सबका गला को काट के रखा है। कोई आदमी ठीक से सोच नहीं पाए वहाँ पहुँचा दिया। एक तो दवाई पिला करके पागल बनाते हैं, और एक पढ़ा करके पागल बनाते है। आदमी को, total ७०० करोड़ आदमी को पढ़ा करके पागल बनाते हैं, ये कहते हैं प्रकाश में गति होती है। प्रकाश प्रतिबिम्ब है भैया, हर वस्तु प्रकाशमान है। इसमे काहे के लिए गति। गति होता है तो लेन देन होता ही है। उसके बाद कहा तरंग होता है, तरंग वस्तु है या अवस्तु है ये आज तक तय नहीं कर पाए। उसके क्या बात है, कितना बात करना शेष है। आज तक तरंग अपने में वस्तु है अवस्तु? अवस्तु है तो क्या? उसका उत्तर है ही नहीं। अवस्तु को पहचाना ही नहीं गया। वस्तु जहाँ है वहाँ space curve होता है लिखा। और लिखा जब पानी में पत्थर डालते है, जहाँ पत्थर है वहाँ पानी नहीं है। पूछा जहाँ मिट्टी है उसको क्या बताते हो, तो चुप हो गए। पत्थर जहाँ है वहाँ पानी नहीं है ये तो पता लगता है, मट्टी जहाँ है वहाँ, पूछा तो चुप हो गए? रुई जहाँ है वहाँ क्या है, वहाँ पानी हट गया? सोचने की मुद्दा है। अब इन सबसे रुई पानी में भीगने से जैसा होता है, मट्टी पानी में भीगने से जैसा होता है उससे ज़्यादा पैनेपन से व्यापक वस्तु में सभी वस्तु भीगे हैं। मट्टी भी भीगा है, पत्थर भी भीगा है, मणि भी भीगा है, धातु भी भीगा है। ऐसा हम प्रस्तुत किये हैं। क्यों किये हैं? क्योंकि हमने देखा है, व्यवस्था में है और व्यवस्था को बताने के लिए इसके अलावा कोई रास्ता नहीं।
जिज्ञासा: भार आकर्षण से, आकर्षण परस्परता से, परस्परता गुरुता -लघूता से, गुरुता और लघूता, रचना एवं सापेक्ष ऊर्जा से आदि आदि
उत्तर: भार आकर्षण से, पहले उसको हजम करो। भार क्या है पूछो। एक वस्तु बड़ा हो एक वस्तु छोटा हो, बड़े वस्तु की अपेक्षा में छोटे वस्तु का भार समझ में आता है। कैसा आता है पूछा, तो तराज़ू में रखने से समझ में आता है। तराज़ू में एक वस्तु रखने से वो झुक जाता है। इसका नाम भार दिया। उसके बराबर कितने के बराबर में होगा? उसको सोचने के लिए पहले गिनते थे- एक चावल का दाना, दो चावल का दाना, दस चावल का दाना, एक गुंजा का दाना, राई का दाना ऐसा सब बताते रहे। उसके बदले में हम १ ग्राम २ ग्राम १ औंस १ तोला आदि गिनना शुरू कर दिए। कई प्रकार से शुरू करके कई प्रकार से अभी कर ही रहे हैं, किन्तु गिन ही लेते है कि इतना भार है। उसको हम स्वीकारते हैं। ये भार कहाँ से आ गयी- बड़ी वस्तु के साथ जो आकर्षण बल लगती है वह भार के रूप में गण्य होता है। चुम्बकीय बल रहता है तो आकर्षण बल रहता ही है। इसमें इनको पढ़ाये हैं रेती में विद्युत् ग्राहिता नहीं है। जिसमे विद्युत् ग्राहिता नहीं है उसमें भार होना नहीं चाहिए, ऐसा होता भी है? चुम्बकीय बल नहीं होगा तो भार कैसे प्रदर्शित करेगा। इसलिए हम कहे की सभी पदार्थ चुम्बकीय बल संपन्न हैं। उसका आधार अणु बंधन भार बंधन के रूप में है, उसके पहले परमाणु अंशों का गठन के रूप में बताया है। ये सब, गठन भी भार के आधार पर ही बनता है। जो परमाणु अंश अणु बंधन में आये तो, अणु, भार बंधन में आ गया। ये भार बंधन में आया, अणुबंधन में आ गया, इन दोनों मिलकर के अणु बंधन भार बंधन के साथ पूरी धरती की रचना हो गई। उसको बर्बाद करने में हम लगे हैं उसको विज्ञान कहा जाता है। कालिदास विद्या हुआ या नहीं हुआ?