प्रधान हो जाते हैं, उसमें(रासायनिक में ) गुण प्रधान होते हैं, जीवों में स्वभाव प्रधान होते हैं मानव में ज्ञान प्रधान होता है।

जिज्ञासा: सापेक्ष शक्तियों की गुण संज्ञा है, सम विषम मध्यस्थ के रूप में पहचान होती है यही प्रभाव है।

उत्तर: सम विषम मध्यस्थ रूप में गुणों को पहचाना गया है। उद्भवकारी गुणों को हम सम कहते हैं, विभवकारी गुणों को मध्यस्थ कहते हैं और प्रलयकारी गुणों को विषम कहते हैं। ये नाम दिया है। गुण का मतलब है सापेक्ष शक्तियां। शक्तियां जब प्रयोग होती हैं किसी का उद्भव करेगा, किसी का विभव करेगा किसी का प्रलय करेगा। कुछ भी न करें ऐसे शक्ति का कोई प्रयोग होते ही नहीं। मानव अपने इच्छा शक्ति, विचार शक्ति का प्रयोग किया, उससे जो होने वाले परिणाम आप के सामने आ चुका है। कुछ बात लगता है प्रलय की ओर जा रहा है। कुछ बात लगता है कि उद्भव की ओर जा रहा है, कुछ बात लगता है कि विभव की ओर जा रहा है। प्रलय वाला ज़्यादा हो गया तब हम सोच रहे हैं।

जिज्ञासा: पाँच कोषों पर स्पष्टता चाहिए।

उत्तर: पाँच कोषों के बारे में हमने दो विधा में प्रस्तुत किया। एक परमाणु में पंच कोषों की बात किया है, दूसरा शरीर रचना में पाँच कोषों को बताया। परमाणु में कम से कम अंशो का जो परमाणु है उसमे कम से कम दो कोष रहता ही है- प्राणमय कोष और अन्नमय कोष। अन्नमय कोष अंशो की घटता बढ़ता हुआ क्रिया को अन्नमय कोष नाम दिया। परमाणु ज्यादा अंशों से होना, कम अंशों से होना इसको अन्नमय कोष नाम दिया।

सत्ता में सम्पृक्त है, सत्ता पारगामी है, वस्तु ऊर्जा संपन्न है, इसको प्राणमय कोष कहा।

उसके बाद प्राणावस्था आयी, जड़ हो गयी पत्ती आ गयी, पत्ती से कुछ लेने वाली बात आयी, जड़ से कुछ लेने वाली बात आ गई उसमे चयन करने के गुण आ गए। जैसे धतूरे का झाड़, गन्ने का झाड़, दोनों को एक धरती पर डालते हैं, गन्ने का जड़ अपने ज़रुरत की चीज़ों का चयन करता है, धतूरे का जड़ अपने ज़रुरत की चीज़ो का चयन करता है। धतूरा खाने से आदमी मर जाता है, और गन्ना खाने से आदमी जीवित रहता है। इसको अध्ययन करने से पता लगता है इनमे मनोमय कोष आरंभिक रूप में शुरू हो गयी। वही बताया पूर्वावस्था में, जीवावस्था के पूर्व में प्राणावस्था में जीवावस्था बीज रूप में बना रहता है। मनोमय कोष यहाँ से शुरू हुई। जीवावस्था आ गई, उसमें मनोमय कोष आशा के रूप में आ गयी, जीने की आशा के रूप में और संवेदनाओं को पहचानने के रूप में आ गयी। तीन चीज़ स्वरुप में आ गयी। उसके बाद मानव आ गया तो ये तो संवेदनाओं को पहचानता ही रहा, और उसके बाद संज्ञानीयता का बीज रहा। वो बीज होने के कारण से कल्पना शीलता, कर्म स्वतंत्रता के साथ जीते-जीते ज्ञान संपन्न होने की इच्छा रही। उसके बारे में हम अनुसन्धान किये हैं, उसमे यदि मानव की ज़रुरत है तो उपकार होगा ऐसा प्रस्तुत किये हैं। 

हरि हर।

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