उसके बाद खनिज संसार के साथ। हम क्या जी पा रहे हैं, पूछा जाए तो, नहीं। ईश्वरवादी इस सब को त्याग दिया, इसे बेकार मान लिया, विज्ञानी इसे सिर पर रख कर चले। इसी के साथ विज्ञानियों ने असंतुलन को स्थापित किया। वो ही असंतुलन आज मानव के लिए हानिकारक बन गया। इसको धीरे-धीरे लोग पहचान रहे हैं, आगे चलकर और भी लोग पहचानेंगे। इस ढंग से विकल्प की बात आयी। पहले मूल अवधारणा में विकल्प, माने दर्शन को अपन ने कहा “जीना ही दर्शन है”। इसलिए जीवन दर्शन नाम आया। जीना ही जब दर्शन है तो मतलब इतना यात्रा हर व्यक्ति के साथ जुड़ा है। समझना होगा ही, सोच विचार करना होगा ही, निर्णय लेना होगा ही, कार्य व्यवहार करना होगा ही, व्यवस्था में जीना होगा ही, व्यवस्था में जीने पर पाँचों आयामों में जीएगा। जीने का फल परिणाम होता ही है। फल परिणाम सहअस्तित्ववादी होगा ही। वो सही माना जाए, यदि सहअस्तित्ववादी नहीं है तो उसको गलत माना जाए।
जिज्ञासा: सहअस्तित्ववाद क्या है, इसे स्पष्ट कर दीजिए।
उत्तर: सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति- सहअस्तित्व। (साथ-साथ होना) साथ-साथ क्या है? ये तो मूलतः अस्तित्व बताया। इस धरती पर चारों अवस्था है ही। चारो अवस्था के साथ जी पाना, ये सहअस्तित्व है। ये तो आपको पता ही है, ईश्वरवादियों ने ये जो चार अवस्था है इसको नकार दिया। इसको माया कह दिया और इसको वैज्ञानिकों ने सच माना। वो जीने की जगह में आ नहीं पाए, इसका विरोध किया। इसमें अस्थिरता, अनिश्चयता को मोल लिया, इसके साथ विरोधी काम किया। अस्तित्व विरोधी काम किया मानव विरोधी काम किया। करना ही पड़ा, दूसरा कोई रास्ता नहीं रहा। इस ढंग से मानव विरोधी, अस्तित्व विरोधी काम करते हुए अपने को प्रचंड विद्वान माना। कौन? विज्ञान। या प्रचंड विद्धवता माना, या प्रचंड विद्या माना। अभी उसमें भी बहुत सारा परेशानी है- विज्ञानी ज़िम्मेवार है या विज्ञान ज़िम्मेवार है? विज्ञानी सच नहीं है मानते हैं, विज्ञान सच है। यहाँ पहुँचते हैं। विज्ञान क्या विज्ञानी के बिना गति बनती है? पूछा जाए तो वहाँ कुंठित है। इस ढंग से वो परेशान हैं। विज्ञानी के बिना विज्ञान का क्या गति है? नहीं है। ईश्वरवाद है, ईश्वर को समझे बिना ईश्वरवाद क्या परंपरा बन पाती है? नहीं बन पाती। यदि समझने के बाद प्रमाणित होता है कि नहीं होता है पूछा जाए तो तर्क से पता लगता है कि प्रमाणित होता है। तो ईश्वरवाद रहस्यमयी होने के कारण से प्रमाण के पास पहुँच नहीं पाया और विज्ञान, विज्ञानी को विज्ञान का धारक वाहक ना मानने के आधार पर विज्ञान से कोई conclusion निकला नहीं, समाधान निकला नहीं।
इस ढंग से अस्तित्व में ही जो वस्तु है उसको ले करके चले। उसको हमने समझा, तो अस्तित्व का कुछ भाग को विज्ञानियों ने सच माना, कुछ भाग को अध्यात्म वादियों ने सच माना। कुछ भाग होने के कारण से दोनों प्रमाणित नहीं हो पाए हैं, संकटग्रस्त हुए, दोनों का दोनों। इसीलिए विकल्प की ज़रूरत है। यहाँ हम आ गए, छोटी सी गवाही से। इस आधार पर हम आ गए हैं तो पहले दर्शन प्रस्तुत किया, दर्शन के आधार पर विचार का आधार प्रस्तुत किया विवेक और विज्ञान। विवेक और विज्ञान को प्रस्तुत करने के बाद निर्णय की बात में आ गए। निर्णय मूलक विधि से अपन शुरू करते हैं ज़िम्मेवारियाँ आती ही हैं। तो जानना, मानना ये ज्ञान विवेक विज्ञान तक हम आ गए। जानने, मानने के बाद पहचानना, निर्वाह करना होता है। ऐसे पहचान के जाते हैं, हम अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था को पहचान लेते हैं।