चल चुकी। विज्ञान बिल्कुल टिके हैं यंत्र को प्रमाण मानने में, अथा से इति तक ये टिके हैं। इस ढंग से विकल्प की आवश्यकता हुई, माने ज्ञान पक्ष की। ज्ञान का धारक वाहक मनुष्य ही है, ऐसा अपन पहचाने। ज्ञान का धारक वाहक यदि केवल मनुष्य है, यंत्र नहीं है, या किताब नहीं है, ये पता लग गया, उसके आधार पर विकल्प के बारे में सोचे। इतनी पृष्ठभूमि को जब छाना, बीना, सोचा, समझा, निष्कर्ष निकाला तब जा करके विकल्प की ज़रूरत है ये पता चला। इस ढंग से विकल्प तैयार हुआ।
विकल्प तैयार होने से कहाँ पहुँचे? दर्शन, विचार, सोच विचार में पहुंचे, हमारा मूल तत्व में, मूल अवधारणाएँ क्या होना चाहिए उसका नाम है दर्शन। जिसके साथ प्रमाणिकता को वर्तना कार्यक्रम है। उसके लिए कार्यक्रम के बारे में अपन बताया जब अनुभवमूलक विधि से हमारा कार्यक्रम सब सही होती है। अध्ययन विधि से अनुभव तक पहुँचा जा सकता है, इसको जोड़ दिया। अपने पूरे दर्शन को अध्ययन किया जा सकता है। अध्ययन करने के पश्चात अनुभव मूलक विधि से व्यक्त हुआ जा सकता है, यहाँ हम आ गए।
पहले बताए ईश्वरवादियों ने अनुभव को ज़िक्र किया है, उन लोगों ने ये बताया अनुभव को बताया नहीं जा सकता। क्यों बताया नहीं जा सकता ये पूछे तो बोले “गुड़ खाया हुआ गूँगा होता है”। गुड़ खाने के बाद गूँगा जो है ना बता नहीं पाता है। मैंने प्रतिवाद प्रस्तुत किया कि बात करने वाला भी तो गुड़ खाता है। बात करने वाला तो बात करेगा ही। ये शुरू किया, ये शुरू किए तो परंपरा के लिए ये अनुकूल नहीं पड़ा, उस समय में। अब हम बात करने योग्य हैं, हम पुनर्विचार कर सकते हैं, सोच सकते हैं, उसके आधार पर विकल्प तैयार हो गया। विकल्प क्या हुआ- अनुभव को बताया जा सकता है। मूल मुद्दा में इतना ही। मूल मुद्दा यहाँ आ गया तो बाक़ी सब इससे जुड़ गए। अनुभव मूलक विधि से हम यदि बता पाएँगे, अध्ययन करा पाएंगे, उस स्थिति में हम बता दिए। यदि दूसरे को अनुभव योग्य बनाया, तो अनुभव योग्य बनाने का क्या मतलब- सत्य बोध करा देना। सत्य बोध यदि होता है तो उसको अनुभव मूलक विधि से प्रमाणित करना हर व्यक्ति से बन ही जाता है, इस आधार पर अपन प्रस्तुत किए विकल्प को। दर्शन का विकल्प जब आया तब ये ‘अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन ज्ञान’ नाम दिया। इसके पहले ‘रहस्य मूलक ईश्वर केंद्रित चिंतन ज्ञान’ प्रस्तुत हुई। उसके बाद विज्ञानी आया, ‘अस्थिरता अनिश्चितता मूलक वस्तु केंद्रित चिंतन ज्ञान’ प्रस्तुत किया। इसका शुरुआत ही है -अस्थिरता, अनिश्चितता, अव्यवस्था है, इसीलिए अव्यवस्था पैदा किया। और वो अव्यवस्था वहाँ तक पहुँचाया स्वयं को और गुरुजी को भी लेकर डूब गए। इसीलिए विकल्प की जरूरत बना। उसका प्रस्तुति हम अपने ढंग से अनुभव मूलक विधि से प्रस्तुत किया हूँ। उसकी पूर्णता को जाँचने का अधिकार सबके पास है, जाँचेगा। जाँच करके यदि पूर्णता निकल पाती है, वो अपनी ज़िंदगी को अर्पित करेगा ही, ऐसा मैं सोच कर चल रहा हूँ। इस ढंग से विकल्प का एक पृष्ठभूमि बनी।
उसके बाद जब हम ज्ञान के बारे में पहुँचे, ज्ञान के अनुरूप हमारा फल परिणाम होने की बात आ गयी। उस बीच में सोच विचार आए, निर्णय आए, कार्य व्यवहार आए, व्यवस्था आए। इन सबसे गुजर कर के हमारा मूलतः जो अनुभव थी, ज्ञान थी, उसके अनुकूल यदि हुआ, उसके पक्ष में हो गया, तब उसको सही माना जाए। अनुभव सहअस्तित्व में होता है, सहअस्तित्व प्रमाणित हो जाए, इतनी ही तो बात है। एक सूत्र में एक वाक्य में इतना ही- सहअस्तित्व में अनुभव होता है और सहअस्तित्व प्रमाणित हो जाए। सहअस्तित्व किसके साथ? सर्वप्रथम सत्ता के साथ और उसके बाद मनुष्य के साथ, उसके बाद जीव संसार के साथ, उसके बाद वनस्पति संसार के साथ और