है, यंत्र में कोई चीज़ सच और झूठ हो नहीं सकती। यंत्र तो आदमी बनाया हुआ है और आदमी ही किताब लिखा है- ये भी इसके साथ ज्ञान हुआ। 

यही कुल मिलाकर के हमारा विकल्प को सोचने की आवश्यकता बनी। मनुष्य प्रमाण होगा, यंत्र प्रमाण होगा, किताब प्रमाण होगा? ये आया तो मनुष्य प्रमाण होना है। मनुष्य को छोड़कर के ये दोनो प्रमाण से कोई प्रमाण बना नहीं, परम्परा बना नहीं, परम्परा को संतुष्टि मिला नहीं, परम्परा के अलावा हम जिस धरती, पानी, पत्थर के साथ जीते हैं उनके साथ भी हम कोई सऊर से काम नहीं कर पाए। और उसके साथ जितने भी अपराध किए उसके परिणाम भी आ गए, तो धरती बीमार हो गयी। धरती बीमार होना सभी वैज्ञानी स्वीकार भी रहे हैं। बीमार होने का कारण विज्ञानी को नहीं स्वीकारते हैं, ये बदमाशी है। उसको ढक कर के चलना चाहते हैं। वो चल नहीं पाते हैं। यह दुष्कर कष्ट अभी आया है। ये सारे के सारे यांत्रिक विधि से जितने भी अपराध हुए उसका कारण विज्ञान है, इसको वो स्वीकारते नहीं। विज्ञान का काम है बता देना, लोग जैसा चाहे वैसा उपयोग करेगा। उसी के साथ मूल में जो विज्ञान की शुरुआत हुई वो राजा के साथ शुरु हुई। राजा को लड़ाई करना था, लड़ाई में सामरिक तंत्र की, सामरिक साधनों की वृद्धि की आवश्यकता रही, उसके आधार पर विज्ञान सामरिक तंत्र में अपना योगदान देने के लिए वचनबद्ध हुआ। उसके साथ राजदरबार उसको मदद दिया, पैसा दिया, उसके आधार पर ये establish हुआ। अभी भी करते ही हैं, युद्ध के लिए कुछ ना कुछ करते ही रहते हैं। करते-करते ऐसा विस्फोटक तत्वों को तैयार किया जो विस्फोट होने के बाद मानव जाति ही ना रह जाए और ना धरती, धरती के रूप में ना रहे। यहाँ तक पहुँच गये। अब उसको प्रयोग करना, नहीं करना, इस पर सोच रहे हैं। उसको कैसे रोका जाए प्रयोग से, इसके बारे में भी दिशा निर्धारित नहीं हो पा रही है। ये सब बातें एक प्रकार से आंदोलन चल ही रहा है, जिसको आप हम सब जानते ही हैं। ये जो बात बनी, एक स्वरूप, इसका भी विकल्प की ज़रूरत महसूस हुई। उसमे अपन ये कहें हैं कि विज्ञान ज्ञान भाग है वो ग़लत हो गया है, तकनीकी भाग ठीक है। ऐसा अपन यहाँ से शुरू किया। तकनीकी training जितने भी देते हैं, उसमें यंत्र बनता है उसमें कोई गलती नहीं होती है और मानव में ज्ञान होता है वो ज्ञान ग़लत हो गयी। ज्ञान को अपन अध्यात्मवादियों के साथ भी प्रयत्न किए हैं, अध्यात्मवादी भी सहअस्तित्व को समझा नहीं, ना भौतिकवादी समझा। 

अब ये समझे क्या चीज़? जिसको अध्यात्मवादीयों ने माया कहा उसको ये सत्य माना और अध्यात्मवादीयों ने इसको असत्य माना, उसको ये सत्य मान लिया। इस ढंग से सोच करके एक प्रतिक्रिया के रूप में ये तैयार हुई भौतिकवाद, उससे जो अनिष्टकारी स्वरूप बनी वो तो विदित हो गयी। ये विकल्प के लिए आधार हुआ। ईश्वरवादी विधि से क्या आधार हुआ? भक्ति विरक्ति में बहुत अच्छे लोग समर्पित हुए। समाज के सर्वोपरि श्रेष्ठ व्यक्ति इसमें समर्पित हुए- भक्ति में भी और विरक्ति में भी। घटिया व्यक्ति एक भी उसमे नहीं गए। जबकि विज्ञान तंत्र में यंत्र बनाने में दारू पीने वाला भी है, दूध पीने वाला भी है। सच बोलने वाला भी है, झूठ बोलने वाला भी है। जबकि जो विरक्ति, भक्ति के वेदी में समर्पित हुए उसमें सर्वाधिक अच्छे लोग हुए। अच्छे लोग होते हुए परम्परा को दे नहीं पाए, ये कष्ट उसमें तैयार हो गया। पूछे तो इसकी परम्परा में ज़रूरत है कि नहीं, तो ज़रूरत है, यही आवाज़ निकलता है। उसके आधार पर इसका भी विकल्प की ज़रूरत बनी। 

तो दोनों की जब विकल्प बनी तो इन दोनों में से कही हुई बातों को सुधारा जाए शब्दों को। या कार्य व्यवहार के लिए कैसा प्रस्ताव रखा जाए, शब्दों को सुधारे बिना तो नहीं हो सकती। तो ईश्वरवादियों ने पहले शब्द ब्रह्म माना, शब्द को सत्य माना, उसके बाद आप्त वाक्य को प्रमाण माना, उसके बाद शास्त्र को प्रमाण माना। इस प्रकार से कई लहर

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