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भाग – 7
👉 विडिओ संदर्भ देखें: Satsang Raipur Bhag-7 – Ank-4
जिज्ञासा: बाबा आपके अपने ऊपर बनी जो film है जो अभी June माह में release हुई जिसका नाम है विकल्प, इस विकल्प का अर्थ क्या है?
उत्तर: विकल्प का अर्थ है- विगत से जो कुछ भी हमको दर्शन मिला, सोच विचार मिला, कार्य व्यवहार मिला, आचरण मिला, संविधान मिला और व्यवस्था मिला और जो कुछ भी मिला हर साँस में, उसका विकल्प। पहला तो मुद्दा ये बनता है। उसके आधार पर हम निष्कर्ष निकाल दिए हैं कि पहले दर्शन सोच विचार का एक विकल्प। दर्शन विचार में इस बात को स्पष्ट कर चुके हैं कि विगत में अस्तित्व को पूरा न समझते हुए अस्तित्व में ही किसी एक भाग को दर्शन का आधार मानते हुए ईश्वरवाद तैयार हुआ और भौतिकवाद तैयार हुआ। अस्तित्व को छोड़ करके तो कुछ कहा नहीं जा सकता, अस्तित्व में ही किसी एक भाग को लेकर के ही ईश्वरवाद चला और ईश्वर इसका नाम दिया। वही सबका ज़िम्मेवार, जीव जगत का ज़िम्मेवार मान लिया। इस ढंग से उसमें सृष्टि, स्थिति, लय को माना। उस सृष्टि स्थिति लय को ये भौतिकवादी भी माने हैं किंतु ये अस्तित्व में जो कुछ भी वस्तु विशेष है जिसको ईश्वरवाद ने माया माना, उसको ये सच माना। इतनी ही तो बात है। किंतु इसको अंतिम सत्य नहीं माना। ये उनके (भौतिकवाद के) साथ रखी हुई एक आधार है ।
ईश्वरवाद पूरा का पूरा अनुग्रहवाद हुआ, भौतिकवाद पूरा का पूरा यंत्रवाद हुआ। ईश्वरवाद जब अनुग्रहवाद हुआ उसके किताब के अलावा दूसरा बताया नहीं जा सकता था, किताब को प्रमाण बताया। यंत्रवाद को ये अपनाया तो यंत्रों को सामने रख करके ये प्रमाण बताते हैं। अभी जैसा ये प्रकाश है, camera है ये यंत्र ही तो है। इस प्रकार के प्रमाण ये बताते हैं। दोनों का कुछ-कुछ लोग कुछ-कुछ दूर तक सही माना, कुछ दूर बाद सही मान नहीं पा रहे हैं। माने अध्यात्मवादी अपने अनुसार जो लोग समर्पित हुए, ईश्वरवाद के दहली पर अपना सर झुकाए। बहुत सारे लोग उसमें ईमानदार भी होंगे, बेईमान भी होंगे, इसको मान लीजिए। तो जो ईमानदार हुए उनसे ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं हुआ जो कि ये परंपरा के रूप में ये चल पाएँ। उसके लिए दो भाग बताया- भक्ति और विरक्ति। भक्ति और विरक्ति को लोग अपनाए अनुष्ठान किए, आजीवन अनुष्ठान किए, इसके आधार पर जो ईमानदार व्यक्ति से भी परंपरा के लिए, जैसे परिवार परंपरा है उसके लिए कुछ मिला नहीं। परंपरा के रूप में चल जाएगा जैसे साँस चल रहा है, आँखे काम कर रहा है, कान काम कर रहा है, ऐसे ये बात बना नहीं।
उसके बाद यंत्रवाद आ गए, मोटर में घुमा दिया, रेल में घुमा दिया, aeroplane में घुमा दिया और चंद्रमा पर यात्रा करा दिया। ये सब करा दिया तो इसको ये सच मानते हैं। सच जो है मानव में सच और झूठ होता है, ये यंत्र में क्या होना है? ऐसा मैं समझा। यंत्र में क्या सच क्या झूठ, यंत्र को चलाने वाले आदमी में झूठ और सच की बात हो सकती