जिज्ञासा: बाबा जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना जो शब्द हैं, उसको स्पष्ट कर दीजिए।
उत्तर: ज्ञान जो है- जानना। ज्ञान जो है मूलतः सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति। नाम क्या दिया? सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व दर्शन ज्ञान, होने का ज्ञान। होना कैसा है? सहअस्तित्व रूप में है। ये बात यदि मूल रूप में पकड़ में आता है, मनुष्य इधर उधर होता नहीं। इसको अपन सुन करके यदि टाल देते हैं, आदमी रास्ता में आएगा नहीं, वहीं काँटा-कूँटा में ही रह जाता है। अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन ज्ञान, पहले ऊपर लिखा है। अस्तित्व जो कुछ भी है सहअस्तित्व रूप में है। सहअस्तित्व मूलतः सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति है। ऐसे प्रकृति चार अवस्था में है, चार पदों में है। इसका व्याख्या दिया। उसमें प्रक्रिया है- विकास क्रम एक प्रक्रिया है, विकास एक प्रक्रिया है, जागृति क्रम एक प्रक्रिया है और जागृति एक प्रक्रिया है, सदा सदा के लिए प्रक्रिया। ऐसा लिखा है।
देखिए सत्ता शाश्वत है, अपरिणामी है। जीवन विकास पूर्वक अपरिणामी हो गया, कितना सही बात है। मनुष्य आदिकाल से अमरत्व को सोचता ही रहा, जीवन अमर है अभी अपन पता लगा सकते हैं। कितना छोटी सी बात हो गई। कितना दुःख दर्द से दूर होने की रास्ता बनी।
“अमरा निर्जरा देवास्त्रिदशा विबुधाः सुराः” अमरत्व को ऐसा कहा है।
अर्थात् जो जरा नहीं होती है वो अमरत्व है। अमर क्या है? निर्जरा, वृद्धयापी नहीं आता है, उसका नाम है जरा, वृद्धयापे को जरा कहते हैं, हमारा बुज़ुर्गों ने कहा है। अजरा, यानी वृद्धयापी होते ही नहीं, बुढ़ापा जिसका नहीं होती, उसी का नाम है- देव, देवता नाम है। ये पहले लिखा है। अभी जीवन में जरा दोष है ही नहीं, परिणाम दोष है ही नहीं, तो इसीलिए जरा दोष नहीं है। मात्रात्मक परिवर्तन से मुक्त हो गया, ये लिखा है। मात्रात्मक परिवर्तन जब तक है तब तक जरा दोष है। रचना विरचना तक है, जरा दोष। इस बात को कहा है। रासायनिक भौतिक वस्तुओं में रचना विरचनाऐं होते ही रहते हैं। जीवन वस्तु में कोई भी रचना विरचना होते ही नहीं। उसमें क्या होता है? चेतना। चेतना के बारे में - जीव चेतना, मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना को स्पष्ट कर दिया। मानव जीव चेतना पूर्वक अव्यवस्था में फँसता है, क्लेश को मोलता है। छोटी सी बात। हालत बैंड है इस सूत्र में, आदमी जात की।
जीव चेतना में गलतियों को, अपराधों को करते हुए, क्लेश को मोलता है। इसका क्या गवाही पूछा? सारा राजतंत्र में जो संविधान बना है, मानव को, गलती अपराध कर सकता है, इसको स्वीकारा है। और सारे धर्म गद्दी आदमी को पापी अज्ञानी कहा है, इससे ज़्यादा बड़ा गवाही कहाँ से लाने की ज़रूरत है?
उसके बाद कथा भागवत के रूप में “मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना” सब कह ही चुके। और उसके बाद में “सुनना सबकी करना अपने मन की” ये भी कह चुके, “ख़ाली हाथ आए, ख़ाली हाथ जाना है” ये भी कह चुके। ये सब तो हम सुन ही चुके हैं, सभी सुने हैं ऐसा मेरा सोच। ये सब झूट की पुलिंदा है। ये भ्रमवश है, भ्रम को झूठ मानोगे कि नहीं मानोगे। खतम हो गई बात। उसी से पैदा हुआ ये “मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना”। उसके बाद “सुनना सबकी करना अपने मन की” ये भी उसी से जन्मा, और उसके बाद इसमें निराशा जब आयी बताया “खाली हाथ में आना, खाली हाथ में जाना” क्या चीज- शरीर। जीवन ज्ञान नहीं था इस बात को प्रमाणित कर दिया कि नहीं? जीवन ज्ञान न होने का ये प्रमाण है। तो जीवन ज्ञान हमारे ईश्वरवादी परंपरा में था नहीं, इस बात का ये प्रमाण है। शिष्ट परिवारों में ये तीनों नारा चला,