वेद मूर्तियों के परंपरा में चला। इससे ज्यादा शिष्ट परिवारों को पहचाना नहीं गया। जब वेद मूर्तियों के परिवारों में ये तीनों नारा चला तो इससे पता लगता है कि जीवन ज्ञान नहीं था। पर्याप्त है इतना? इतना गवाही के साथ हम आगे चल दिया। 

उसमें जीवन को जब समझा, आत्मा माया सम्पुटित बताया। माया सम्पुटित होने के बाद माया ज़्यादा बलवती है कि ब्रह्म ज़्यादा बलवती है ये आया, उसमें जीवों को ध्यान की ओर जाना था, कर्म की ओर चले गए, फिर कर्म में पाप-पुण्य होता ही है। पाप पुण्य होता है तो कर्म बंधन आ गया। कर्म बंधन के आधार पर आवागमन हो गया, स्वर्ग और नरक। धरती को कर्म भूमि माना, फल को भोगने के लिए स्वर्ग नरक बताया। ऐसा बताया। मैंने इसको decide किया इसका फल धरती पर ही मिलता है। इसके लिए कोई स्वर्ग जाने की ज़रूरत नहीं, ना नरक जाने की जरूरत है। इसको हमने समझा और बताया है। ऐसा हमने कुछ प्रयोग किए, अभी बिलासपुर में एक जेल में कैदियों के साथ कुछ सत्संग किए। उसमें उन लोगों ने लिखित रूप में दिया, इसको सरकार को प्रस्तुत किया गया, उन्होंने ये लिखा है कि हम पकड़ में आए हैं इसलिए अपराधी हैं, जो पकड़ में नहीं आए है वो हमसे ज़्यादा अपराधी घूम ही रहे हैं। दूसरा ये कहा, हम जो सर्वोच्च कोटि के अपराध किया उससे आगे के अपराध के लिए हम सोचते रहे इसके पहले, यहाँ बैठकर के भीतर सोचने के लिए बहुत समय है। हम ऐसा सोचते रहे, सर्वोच्च कोटि के जो अपराधी हैं उनसे आगे के अपराध कैसे किया जाए, इसके बारे में हम सोचते रहे। उसके बाद ये बोले कि अभी तक की हम को जीवन ज्ञान ना होने के कारण से हम भ्रमित हो करके सारे अपराधों में फँसते ही रहे। ऐसे हर व्यक्ति फँसा है। उनके अनुसार कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो अपराध नहीं करता। उसके बाद ये कहा कि जीवन विद्या आने के बाद हमारे विचार में परिवर्तन हुआ कि हमको न्यायपूर्वक जीना चाहिए। तीनों बातों को घोषणा करने के बाद यही लिखा। 

उसके बाद हमने सोचा कि ये इतना अच्छा सोच पाते हैं। इनके लिए क्यों ना ऐसा व्यवस्था प्रावधानित किया जाए कि ये निर्दोषी होकर निकल जाएँ। उसके लिए हमने दो स्टेप दिए आगे, लिखकर Commissioner को दिया। 

१. बंद जेल से खुली जेल में एक अवसर पैदा किया जाए, देखरेख यथावत किया जाए। उनके साथ उनके पहचान का एक व्यक्ति रहने की अनुमति दिया जाए, और उसके साथ अपने श्रम से आजीविका को चलाने के लिए व्यवस्था किया जाए। 

२.उसके बाद जिसके साथ ये अपराध किए थे, उन्हें इन के साथ रहने का अवसर दिया जाए। इनको वो देखें जाँचे कि इनमें कोई परिवर्तन हुआ या नहीं हुआ। जाँचे, वो बताएँ। यदि वे कहते हैं कि परिवर्तन हो गया उसको सरकार माने। उसके पहले हम देखते हैं यदि हमको समझ में आता है परिवर्तन हो गया है उसको मानें। उसके पहले आपका सरकारी अमला देखें कि इनमें परिवर्तन आया है कि नहीं आया है, परिवर्तन आया है तो उसको माना जाए। इन तीनों विधि से इसको गवाही माना जाए। पहले ये अपराधी हैं इसकी गवाही आ चुकी, उसके आधार पर इनको सजा हो चुकी। इन तीनों गवाहियों के आधार पर इनकी बाकी सजा को माफ़ कर दिया जाए। इनको अच्छी ढंग से जीने के लिए व्यवस्था दिया जाए, उनको अपने ढंग से जीने के लिए छोड़ दिया जाए, दो में से एक होगा। छोड़ने के पश्चात भी आपके पास निगरानी करने की व्यवस्था बना ही है। पुनः इनका मन तो नहीं बदला उसको देखा जाए। ऐसा बात है।

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