शहडोल ज़िले में एक आदमी ने अपना भाई का खून कर दिया जिसे केवल उसकी भाभी देखी थी और कोई देखा नहीं था। गवाही एक ही हुआ। प्रतिवाद में पत्नी की गवाही को गवाही नहीं माना जाता है। उसके अलावा कोई देखा नहीं। पत्नी तो अपना गवाही दी। ज़मानत में वो वापस आ गए और भाभी को धमकाया, तुम यदि गवाही दिया तो समझ लो की तुम भी नहीं रहोगे धरती पर। उनका एक और भाई था वो छोटे भाई झूठी गवाही दे सकता है ये तैयारी करते रहे, छोटे भाई को भी धमकाया तुमने देखा नहीं है, झूठी गवाही देना नहीं। हमने देखा नहीं है सुना है बोलो। ऐसा धमकाया तो उनका पत्नी को गवाही बदलना पड़ा, हम देखे नहीं थे कह दी वो। उसके आधार पर वो आदमी छूट गया और भाभी को अपनी पत्नी बनाया और अभी वो आदमी जीवित है, ये न्याय है?
इस प्रकार के अपराध के साथ अपराध की श्रंखला सोचने वाली बात आता ही है। तो वहाँ कैदियों ने बताया, हम अपराध के जगह में न्याय को सोच सकते हैं ये हमको यहीं जीवन विद्या को सुनने के बाद पता चला, इसके अनुसार हम जियेंगे। यही वचनबद्ध हुए वो। इससे अच्छा क्या result हो सकता है, आप सोचो। और हम जीने के लिए तैयार हैं ये कहा। उसके बाद उसका कोई लाभ नहीं हो पाया उन लोगों को। हम लोगों ने कहा इनको एक अच्छा आदमी बनाया जाए, ये पुलिस वालो की हविस पूरा करने के लिए material ना बनाया जाए। लिख कर दिया।