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भाग – 8

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उत्तर: ज्ञान के बारे में ये स्पष्ट है, सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व दर्शन ज्ञान। दर्शन ज्ञान का मतलब है, समझ- हम समझ में आ गया। समझ में कब आ गया? अनुभव कर लिया तब समझ में आया। उसी प्रकार जीवन ज्ञान- जीवन कैसा है, क्यों है इसका अनुभव हो गये। यह ज्ञान हुआ। उसी प्रकार मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान। मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान जब आती है, तब उसका प्रयोजन समझ में आता है- न्यायपूर्वक जीना पहला, उसके बाद संतुलनपूर्वक जीना, उसके बाद नियंत्रण पूर्वक जीना, उसके बाद नियमपूर्वक जीना। ये चार भाग पूरा हो जाता है। 

नियम आचरण के रूप में आता है। आचरण व्यवहार के रूप में प्रमाणित होता है। इसके पहले विचार आता है, विचार रहता ही है, वो विज्ञान और विवेक, दो चीज, दो खाके में बताया। ज्ञान के अनुरूप विवेक होता है। सहअस्तित्व के अनुरूप यदि विवेक होता है उसका नाम दिया है, मानव लक्ष्य, जीवन लक्ष्य दोनों पहचान में आना। समझ में आना, पहचान में आना। यह मानव लक्ष्य, जीवन लक्ष्य दोनों पहचान में आने से जीवन लक्ष्य स्वयं में अनुभव के रूप में होना पाया गया। और अनुभव के रूप में हो करके वो मानव लक्ष्य के रूप में प्रमाणित होना पाया गया। मानव लक्ष्य के रूप में जब प्रमाणित होने गए तब पता चला समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व रूप में प्रमाणित होना पाया गया। जब ये चार विधा में प्रमाणित होना हुआ उससे पता चला इसमें जीवन मूल्य प्रमाणित हो जाती है, इसी में। सुखी होना जीवन मूल्य है, शांति पूर्वक रहना जीवन मूल्य है। शांति क्या चीज़ है- समाधान प्रस्तुत करता है शांति, समस्या प्रस्तुत करता है अशांति। कितना छोटी सी बात है। हर व्यक्ति और हर अज्ञानी, ज्ञानी, विज्ञानी तीनों जाँच सकते हैं कि नहीं। ऐसा बन गया ये। अशांत हैं, मतलब है हम अपने विचार में संतुलित नहीं हैं। अपने विचार में संतुलित कब होते हैं- वो पता चला समाधान के साथ समृद्धि हो जाए। अभी ये बहुत अच्छा प्रावधान है इस विचार का, अध्यात्म और विज्ञान ।ये दोनो इस बात को पहचाना है, शांति पूर्वक रहने के लिए समाधान समृद्धि आवश्यक है। समाधान के बिना शांति बनता नहीं, और समाधान के बाद समृद्धि के बिना भी शांति नहीं बनता। इस ढंग से अपन पता लगा लिया, समाधान समृद्धि पूर्वक जीने से सुख, शांतिपूर्वक जीना बनता है, ये जीवन मूल्य समझ में आ गए। सुख, शांति पूर्वक जीना बन गए उसके बाद आगे आए तो समाज सूत्र व्याख्या रूप में हम जीते हैं, अखंड समाज सूत्र व्याख्या के रूप में हम जब शुरू करते हैं ,परिवार में जीना, मूल्यों का निर्वाह करना हो ही जाता है। स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्य, मानव मूल्य इन तीनों मूल्यों को हम प्रमाणित करना बन ही जाता है। इन मूल्यों को निर्वाह करते हैं, संबंधो में विश्वास हो ही जाता है। सम्बन्धों में विश्वास होना ही , मानव सम्बन्धों में विश्वास परंपरा ही अखंड समाज का सूत्र है, उसका निर्वाह होना ही व्याख्या है। निर्वाह होने के लिए क्या बताए- अखंड समाज

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