व्याख्या, ये बनता है, मानव जाति एक के रूप में जीना है व्याख्या करना है। मानव धर्म एक है, इसको व्याख्या देना है, ये हमारा जीने में आना है। मानव जीने में ही सूत्र, व्याख्या प्रमाणित होता है। ज्ञान प्रमाणित होता है, ज्ञान जीवन मूल्य के रूप में प्रमाणित होता है, उसका व्याख्या मानव लक्ष्य के रूप में, मानव मूल्य के रूप में, मानव व्यवहार के रूप में, मानव कार्य के रूप में, मानवीय व्यवस्था के रूप में, शिक्षा के रूप में, सुरक्षा के रूप में, न्याय के रूप में, और ये अपने आप से प्रमाणित होना शुरू होता है। ये अखंड समाज सूत्र कहलाया। वो पाँच सूत्र में फैलता है व्याख्या- शिक्षा संस्कार के रूप में, न्याय सुरक्षा के रूप में, उत्पादन कार्य के रूप में, लाभ हानि मुक्त विनिमय कोष के रूप में, ठीक है, विनिमय कोष बताया माने हमारा समृद्धि हमारे यहाँ कोषित रहता ही है। हम जितना रख पाते हैं उतना ही हमारी समृद्धि हो सकती है, (वस्तुओं को) वस्तुओं से ही समृद्धि प्रदर्शित होता है, पैसे से समृद्धि प्रदर्शित होता नहीं। इसके आधार पर लिखा प्रतीक प्राप्ति होती नहीं, उपमा उपलब्धि होती नहीं। अभी तक अपना जो झंझट है कला साहित्य में उपमा और प्रतीक, उसी में मर गए, सब का मौत हो गया, बेनम्बर हो गयी बात। कोई प्रयोजन नहीं निकला, केवल दारू नशा शेष रह गया, लफ़ंगाई शेष रह गया साहित्यकारों के पास, और कोई प्रमाण एक भी साहित्यकार प्रस्तुत नहीं कर पाया। मैं कवि स्वयं रहा हूँ, मैं इसको अनुभव किया हूँ, कवि साहित्यकार कैसा होते हैं। बिना सर पैर की बात करना ही साहित्यकार है, बिना सर पैर की बात करना ही कलाकार है। 

इसलिए आपको अभी बताया ये studio, studio man इसको बिलकुल सर्वथा अलग करिए studio weapon उसको आप उपयोग कर सकते हैं। weapon औजार, ठीक है। इस बात को हमने अपना आरजू प्रस्तुत किया। अब इसको आगे जैसे comment करना है, कुछ कहना है, ये पूरा बात को समझा हुआ आदमी से कहलाइए। वो ज्यादा प्राभवशाली होगी। अभी अपन क्या सोच के किया कि वो ज्यादा लोगों के मन में आया है एक आदमी, उनसे लिखाने से ज्यादा प्रभावशाली होगा ऐसा कर दिया अपन, technically ऐसा हो गया। तो वो technique को थोड़ा सा हम यहाँ आरजू करना चाहा हूँ, वो technique को इसमें उपयोग किया ही ना जाए, और इसमें भद्दगी के अलावा दूसरा कुछ होगा नहीं। इसको कहा वो आदमी को देखेगा क्या हालत होगा। इसको आपने comment कराया, वो आदमी को देखने वाला क्या समझेगा। बात इतना ही है। जब तक वो आदमी हमारे संपर्क में नहीं आएगा, कल्याण है। तब क्या होगा। ये सब बात सोचने की मुद्दा है। इसलिए मैंने आरजू किया है, इसमें जो आदमी रचा है पचा है, ऐसे व्यक्ति से comment कराया जाए।औजार तो अपन प्रयोग कर ही सकते हैं, कोई problem नहीं। 

तो इस ढंग से विकल्प कितनी जगह में फैल गई, एक तो ज्ञान रूप में विकल्प हो गया। क्यों? अध्यात्म ज्ञान अस्तित्व दर्शन ज्ञान को दिया नहीं, ना भौतिक ज्ञान दिया। और उसके पश्चात विवेक को मानव लक्ष्य, जीवन लक्ष्य के रूप में, ना तो अध्यात्म ज्ञान दिया, ना भौतिक ज्ञान दिया है। ये सहअस्तित्व ज्ञान देता है, इसीलिए विकल्प हुआ। उसके बाद इसके आगे चलें हम, मनुष्य के विवेक से जो पहचान हुई मानव लक्ष्य, जीवन लक्ष्य उसके लिए दिशा निर्धारित करने के लिए विज्ञान का प्रयोग बताया। मानव के लिए विज्ञान asset होगा कहते हैं। बोलिए, ये उचित होगा कि नहीं होगा? अभी जो बताया ना fission, fusion को विज्ञान का अंतिम चरम लक्ष्य मान रहे हैं, वो ठीक है, ये ठीक है आप सोचिए। अभी क़रीब-क़रीब सभी देश के बोर्डेरों में बिछ गए, यदि बचा-खुचा होगा तो और बिछ ही जाएंगे। कहीं भी बत्ती जलेगी सब जगह में जलने की व्यवस्था है इसमें। उसको कुछ नाम यही देते हैं, वो सब अपने जगह में है, हम उसके बारे में कुछ कहना नहीं है। अभी इतना ही बात है, वो लक्ष्य ठीक है या यह लक्ष्य ठीक है,

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