है? उपयोगिता को enhance करना है। उपयोगिता को enhance करने में समृद्ध होता है, कुकर्मों को enhance करने पर जेब काटना बनता है। कितना बढ़िया हो गये, बिलकुल सामान्य सिद्धांत हो गये ना ये। ये सामान्य रूप में समझा जा सकता है ना? अच्छा इसमें अपवाद हो सकते हैं, अपवाद को अपन नकारा नहीं है। इनमें से बच के चलने वाला आदमी है और उसके बावजूद ये सब oven में चलते हुए, मनुष्य सारा काम अच्छा बुरा दोनों करते हुए ५१% ठीक है। ये परम्पराएं जो शिक्षा परम्परा है, व्यवस्था परम्परा है, संविधान परम्परा, व्यापार परम्परा है, ये पूरा का पूरा सड़ चुके हैं। धर्म परम्परा, राज्य परम्परा, शिक्षा परम्परा, व्यवस्था परम्परा, ये चारों परम्पराएं ९९%, नो नो के हिसाब से दस बीस बार लगा दो बाकी बचा-खुचा होगा तो उतना ही बचा है। क्या बचा? पदार्थ के बारे में विज्ञानीयों ने सोचा, तकनीकी layman production, माने श्रम जीवियों का production, श्रम करने वालों से सारा तकनीकी उपजा, वो आज तक सही है, उसमें गलती नहीं है। श्रम करने वालों से सारा तकनीकी स्थापित हुई। उसको विज्ञान अपनाया हमारा है, माने वहीं से reservation चालू हो गया। वो किया एक श्रम नहीं ! वो पहले किया हुआ श्रम को, हमारा वाला patent कर लिया, उससे आजीविका चलाने लग गए, इसको विज्ञान माना जाता है। आप ही सोचो, कहाँ तक आदमी के साथ आदमी सही किया है, धोखा किया है, आप ही सोच लो। बात बता रहे हैं अभी, अभी कोई आरोप लगाने की बात भी ना सोचा जाये, घटनाएं जैसा गुजरा है, उसके बारे में वर्णन है ये। ठीक है, इस बात को अपने को परिशीलन करने की जरूरत। अब जो है ना ज्ञान ग़लत हो गई, और तकनीकी ठीक हो गयी। तकनीकी कैसा ठीक हो गयी? श्रमजीवियों से पैदा हुआ है सारा का सारा तकनीकी। इसीलिए वो ठीक हो गया। और ये जो है ना वो पूरा reservation के लिए सोचा सारा ज्ञान, ये पूरा का पूरा गलत हो गया। क्या हुआ, reservation, specialisation दो नाम देते हैं इसके लिए सोचा, ये ज्ञान ग़लत हो गया। ये दोनो भाग मनुष्य को धोखा धड़ी में डालने के ही खाका बनाता गया। 

इसमे क्या हो गई। तो हम सच बोलना जानते ही नहीं हैं, अंतिम सत्य को ये जानते भी नहीं हैं। 

विज्ञानी क्या सोचता है, एक नियम बनाता है, नियम को मशीन में देता है, मशीन जो बताता है, उसको अंतिम सत्य नहीं मानेगा, इसीलिए आगे की सोचने के लिए जगह बना रहे हैं, ऐसा मानते हैं। quantum physics के अंतिम निष्कर्ष निकला हुआ हमारे पोते से हम पूछा हूँ, वो जीवन को नहीं बता पाया. सत्य को नहीं बता पाया। 

तो अभी इस विधि में, जिस विधि से हम चल रहे हैं उससे क्या हमको एक बहुत बड़े भारी धैर्य सम्बल मिला, इसमें जो हमारे पिताजी या दादाजी ज्ञानी हो गए उसके आधार पर हमारा पूजा होने वाला नहीं है। हमारा दादा ज्ञानी हो गये, पूज्य हो गये, इसके आधार पर हमारा पूजा हो ऐसा होने वाला नहीं है। कितना बड़ी भारी रास्ता निकल गया। देखो ये घटना से “वो” निकला, “शुभ”। यदि ये घटना नहीं होती शायद हम उसमें पूरा नहीं पड़ते। आज हम गवाही दे सकते हैं, ठोक बजाऊ कह सकते हैं, हम अच्छे हो गए, हमारे बच्चों को श्रेय मिलेगा ऐसा नहीं होगा। उनको श्रेय पाना है, वो समझना ही पड़ेगा। ये कहाँ से शुरू हुआ? जब हम समझे, मेरे श्रीमती जी को हम समझाए, पहला। पहला तो वो ही है, पूरा का पूरा हमारा सारी अवस्थाओं में हमारा अभिभावक के रूप में मेरी पत्नी काम किए, मेरी संरक्षक के रूप में काम किए। ठीक है। काम करने के बाद हमारा पहला कर्तव्य में , हमने जो पाया है इनको बतावें, बताया। और धीरे-धीरे २-४-१० दिन में सुनी, कुछ समझ में भी आया, कुछ समझ में नहीं आया। वो बोलती है,

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