तुम संसार को लोकोपकार करते रहो हम सेवा करते रहूँगी। उसके बाद क्या बचता है हमारे पास? उसके बाद हम सोचने लगे किसको बतावें? तो एक निष्कर्ष निकला, कि भाई जो समझ सकता है उसको समझाओ। ये अपने विवेक से निकल गया। निकल गया तो, इसको जब हम शुरुवात किये तो कहा कि प्यासा कुआँ के पास आता है। तर्क का कहीं कमी नहीं है। अच्छा, कुआँ के पास आता है, तो आप काहे को दौड़ते हो। ऐसा हमको डाँटने लगे। डाँटने लगे तो हम सोचने लगे, बात तो ठीक कह रहे हैं, इसका क्या उत्तर होगा। मुझको ये ज्ञान आ गया, विज्ञान युग आ गया pumping set लगा दिया, कुआँ से टोंटी लगा दिया मरीज़ के मुहँ के पास, और प्यासा कुआँ के पास आने की जरूरत नहीं है, कुआँ प्यासा के पास चले गया। हम ऐसा तर्क पेश करने लग गये, उसमें वो निरुत्तरित हुए। ऐसा एक-दो बात को बताया, ऐसा कुछ ऐसे संयोग योग ऐसा हो कर के कुछ सिखाया, कुछ समझना पड़ा ऐसे हो कर के हम चल रहे हैं। 

इसी आधार पर आज भी मेरा विश्वास है, मेरे लिए, हम किसी से मिलता हूँ, हमको कुछ ना कुछ प्रेरणा मिलता ही है। वृथा तो अभी तक कोई आदमी गया नहीं। जिसके साथ हम डाँटता भी हूँ, उनसे भी हमको प्रेरणा मिलता है, जिसके साथ हम प्यार करता हूँ, उनसे भी हमको प्रेरणा मिलती है। इससे ज़्यादा क्या बताऊँ, क्या बयान करूँ? इसमें  क्या माना जाए? इसमें माना ये जाए, हमारे पात्रता की बात है, हम कैसा लोगों को स्वीकारता हूँ। छान करके जो अच्छा भाग है उसको हम स्वीकारते हैं। अभी का practice क्या है, कोई एक बात ख़राब हो गया, सब को पोत दिया, डामर। 99 ठीक रहा एक छेद मिल गया उसके ऊपर डामर पोत दिया। ऐसे में तो आदमी दरिद्र ही हुआ है। आदमी जात जो है दरिद्र हुआ, कैसा? इस ढंग से हुआ। माने ५१% से आगे क्यों नहीं बढ़ा, इसी आधार पर। एक दूसरे का छिद्र देखने की विधि से। उसको हमारे बुजुर्गों ने पता लगाया था, छिद्रान्वेषण ठीक नहीं है, ऐसा लिखा। छिद्रान्वेषण के बदले मे क्या किया जावे? हँस क्षीर न्याय, माने नीर-क्षीर न्याय को अपनाना चाहिए, गुण ग्राही बुद्धि होना चाहिए। ये सब उपदेश देकर के गए। गुण क्या है वो पूछा, उसको बता नहीं पाए। गुण के बारे में कहा, वही समाधि में जाओ चुप हो जाओ यही बताए। ये लोगों को पटा नहीं। ऐसा बात बन करके अपन कहीं ना कहीं भटकते रहे। पूर्वजों ने काफ़ी परिश्रम किया इसमें ईमानदारी से, ये विज्ञानी बेइमानी से परिश्रम किया। हमारा लोहार का चोट है ये इसका ज़िम्मेवारी मेरा ही है और किसी का नहीं है। हम से संसार के सात सौ करोड़ आदमी viva कर लें हम इसको प्रमाणित करूँगा। भड़ाम बेइमानी से शुरू किया, उसका क्या पहला प्रमाण, युद्ध सामग्री बनाने के लिए विज्ञानी शुरू किए। इनके इतिहास में लिखा हुआ है। इससे ज्यादा क्या प्रमाण होना। युद्ध सामग्री बनाने में जो प्रोद्योगिकी विधि आयी, उसमे पैसे की आवश्यकता है, पैसे वालों ने प्रोद्योगिकी बनाया। प्रोद्योगिकी बनाने से लोकव्यापिकारण हुआ, लोगों के लिए सुलभ हो गये। अभी जो जैसे wireless set को आप रखे हो, जिसको आप mobile कहते हो, इसको नेहरू के समय में बंगाल में एक polytechnic के एक प्राध्यापक इसको तैयार किया था। उस समय के प्रधान मंत्री के सामने ले गया, इसको आप governmetnt ले लो, या नहीं तो हमको patent करने दो या इसको बेचने दो। तीनो को अड़चन पैदा किया उन्होंने। वही चीज अभी आपके जेब में रखा है। 

जिज्ञासा: अड़चन क्यों पैदा किया? 

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