हम अच्छी तरह से देखा हूँ, समझा हूँ, मानव चेतना में जी कर देखा हूँ, वो बिलकुल पास में दिखता है देव चेतना, दिव्य चेतना। ठीक है। 

जिज्ञासा: आपके ऊपर जो विकल्प फिल्म बनी है उसमे धारणा, ध्यान समाधि त्रयमेकत्र संयमः, ये जो संयम नाम का शब्द आया है, और आपने जो समाधि के बाद संयम किया उसको थोड़ा स्पष्ट करके बताइए, क्या चीज है वो? 

उत्तर: उसमे कोई खास बात नहीं, थोड़ी सी ही बात है। थोड़ी सी बात क्या है, इसमे लिखा है “धारणा, ध्यान समाधि त्रयमेकत्र संयमः” यह पतंजलि ने लिखा है। यह  पतंजलि योगसूत्र में लिखा है, पतंजलि लिखा है कि नहीं लिखा है हम नहीं जानते, वो योग सूत्र में लिखा है। इसको आप भी पढ़े हैं, मैं भी पढ़ा हूँ। इस संयम के बारे में पतंजलि योगसूत्र में विभूति पाद नाम की एक चीज़ है, उसमें संयम की सभी बात लिखा है। उन संयम की २०-२५ प्रकार का संयम लिखा है, उसको हमने पढ़ा है। पढ़ने पर जो हमको बोध हुआ, यह अज्ञात को ज्ञात करने का एक भी संयम विधि नहीं है। यह  हमको बोध हुआ, बाक़ी को कैसा होगा हम नहीं जानते, मुझको जो बोध हुआ उतने भर को बता रहा हूँ। इतना भर पकड़ो, समाधि के बाद संयम होता है। क्यूंकि हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था, दूसरा कोई रास्ता होता तो और कर लेते हम, दूसरा कोई रास्ता थी नहीं, उतने को स्वीकार किया। स्वीकारने के बाद बहुत अच्छी बुद्धि से सोचा क्या करना चाहिए, इसको उल्टा कर दो। ये क्या लिखा है- धारणा, ध्यान, समाधि, हम क्या लिखेंगे- ‘समाधि, ध्यान, धारणा त्रयमेकत्र संयमः’। इस विधि से हम संयम किया, वो कहा हुआ विधि से हम नहीं किया, हमको कोई विभूति छुआ नहीं। विभूतियों को महापुरुष लोग जो ले गए उनके लिए नमस्कार, एक ऊदबत्ती, एक नारियल। इससे ज़्यादा हम कुछ कह नहीं सकते ना कुछ व्याख्या भी करना नहीं चाहते। तो उसको ले गये, वो सिद्धियाँ कैसा मिलीं हम तो देखा नहीं वही लोग बताएँगे। इसमें अभी बताने योग्य व्यक्ति एक ही है- वो सत्य साई बाबा। अभी और एक साई बाबा हो गया बताते हैं। वैसा कुछ कहते हैं लोग बाग, उन्ही से पूछा जाए, तो हमको इसका पता नहीं। हमने इसको उल्टा किया, धारणा, ध्यान, समाधि को उलटा किया, उलटा करने से क्या हुआ, उसका परिणिति में हमको अस्तित्व अध्ययन करने में आया। जैसा अध्ययन करने में आया, उसके बाद में हम उसको अनुभव पूर्वक प्रमाणित कर सकता हूँ, इस जगह में आ गये। प्रमाणित करने के लिए तैयारी किया, प्रमाणित करने के क्रम में पूरा दर्शन लिखना बना। उसको व्यवहार रूप देने में हम प्रयत्नशील हैं। ठीक कर रहा हूँ कि गलत कर रहा हूँ? इसमें ये पूरा विकल्प निकल गया। एक जगह में reject करना हमारे लिए कितनी बड़ी भारी उपकार हो गया। यदि उस झासा-पट्टी में जाते, सिद्धि की झासा-पट्टी में जाते, हम यहाँ तो नहीं आते। और ही कुछ कर लेता। क्या कर लेता? संसार को जितना वंचना किये हैं, उससे ज्यादा अच्छा वंचक हम हो सकते थे।

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