कोई परम्परा नहीं बनी, बुरा से भी कोई परम्परा बनना ही नहीं है, उस जगह में हम बैठे हैं। अभी भी अच्छा-बुरा सोचने वाले हैं ही, कई लोग अच्छा सोचते हैं, कई लोग बुरा सोचते ही हैं। ये जो अंतविहीन बुराई और अंतविहीन अच्छाई की ओर हम चले गए, जो हमारे पकड़ में आता नहीं। और भौतिक विज्ञान भी यही कहता है कि विकास एक अंत विहीन प्रक्रिया है। इसको भी कहा साधना कब तक करना, अंत विहीन- जब तक तुम भगवान में विलय नहीं हो जाओगे तब तक साधना करो। ये कह दिया। उधर भी ऐसा ही इधर भी ऐसा ही, आज भी वैसा ही है। 

इसमें हमने क्या किया- अथा इति दोनों को खोज लिया। अथा क्या चीज़ है? सहअस्तित्व ही नित्य अथा है, सहअस्तित्व में प्रमाणित होना ही नित्य इति। निरंतर सहअस्तित्व में प्रमाणित होना ही निरंतर इति है और अथा क्या चीज़ है? सहअस्तित्व ही अथा, निरंतर अथा। आज के लिए अथा नहीं, निरंतर अनादि काल से अनादि काल तक अथा इति, ऐसा जोड़े हैं। ये बात यदि अपने को पटती है, इसको जाँचने के लिए अपने को लगाना ही पड़ता है। लगाने के लिए क्या दिया- पहले सूचना, उसके बाद उस पर होने वाले शंका समाधान, उसके लिए आप कार्य गोष्ठी करते ही हो, उसके बाद अध्ययन। अध्ययन आदमी कराना चाहिए। उसकी व्यवस्था अपने को देना है। अभी हम उस जगह में पहुँचे नहीं हैं। अध्ययन के लिए प्रेरणा शुरू हुई है। अध्ययन कराएगा कौन? उस बात के लिए हमको हर एक institution में आदमी को पहचानने की ज़रूरत है। समझा हुआ आदमी ही अध्ययन कराएगा, प्रमाणित आदमी ही कराएगा। अभी अमरकण्टक में गत मई माह के बाद, बिलासपुर के Technical college के principal हमारे पास आए थे। उस समय में उनसे बात हुई थी कि आप एक कार्यगोष्ठी में अमरकण्टक आओगे उसके बाद ही आपके institution में आना होगा हमारा। वो आदमी आया उन्होंने बताया कि हमारा institution में एक ऐसा व्यक्ति सदा-सदा के लिए हो जो कि हमारे institution में प्रबोधन भी करें और आस पास के गाँव में भी प्रबोधन करें, ऐसा आदमी की आवश्यकता है।उसकी आवश्यकता को कैसा आप पूरा करोगे? हम पैसा दे देंगे। पैसा देने के बाद तुम्हारे जैसा ही हो गया आदमी वो, मैं बोला। तुम जैसा नौकर हो वैसा ही वो भी हो गया। नौकर होने के बाद करेगा क्या भाई। उनका हाथ पैर मुँह चारों चीज बंद है। हमारे यहाँ बैल चलाते हैं फसल में, उसके मुँह में टुकनी बांधते हैं वो फसल नहीं चर पाएगा ऐसा मानते हैं। वो फसल ही ना चरे, अरे भई फसल जिस से पैदा हुआ वो चरेगा नहीं तो कौन चरेगा। ऐसा भी एक तर्क आ सकता है, उसके लिए तुम मुहँ बाँधे हो। उसी प्रकार से जो आप यदि मुहँ बांध कर रख लिया एक अच्छा  आदमी को, हमारा एक आदमी घट गया। इससे कोई फ़ायदा होने वाला नहीं है, ये मैंने बोला। होना यह चाहिये कि ऐसा आदमी यहाँ यदि रहेगा वो स्वायत्त रहेगा। स्वायत्त कहलाने का क्या मतलब? वो अपना खेती बाड़ी लेकर तो नहीं आएगा, आप खेती-बाड़ी, गोशाला, कर्मशाला का व्यवस्था कर दो, अपने मन से वो उपयोग करेगा और खेती, बाड़ी, गाय, गौशाला, कर्मशाला आप ही का रहेगा। इस विधि से यदि आप सोच पाएँगे तो ऐसा व्यवस्था किया जा सकता है। वो आदमी आपके हुकुम के तामील नहीं करेंगे क्योंकि आप उनको कुछ नहीं सिखाए हैं। आप उनको कोई आदेश दे करके चला नहीं पाएँगे। वो जैसा program देंगे, हम जो समझाया हूँ उसको समझाने के लिए, उस program को आप अपने समय के अनुसार स्वीकारोगे, ये स्वतंत्रता आपकी है, ऐसा हम ने सुझाव दिया। उसमें उन्होंने दूसरा गोष्ठी किया उसमें उनके college के दो चार और professor थे उसमें वो सहमत थे। इसको किया जा सकता है, ऐसा कह रहे हैं, इसको आगे चल करके देखेंगे। 

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