से कह रहा हूँ। इसको हम अच्छी तरह से जाँच चुका हूँ, हमारे ज्ञान के परत पर पूरा का पूरा गुजर चुका है धरती का मानव। कोई भी मानव, घटिया, अच्छे से अच्छा बचा नहीं। मेरे चित्र माला में आया नहीं है, ऐसा कोई घटिया आदमी नहीं, अच्छा आदमी भी नहीं, बचा नहीं है। सबको हम देख चुके हैं। समाधि, संयम का यदि त्राण प्राण है वो ये ही है। उससे ये ताकत बढ़ी, ऐसा प्रस्तुत होने के लिए आवाज़ का ताक़त बढ़ी। प्रस्ताव का ताक़त भी बढ़ी। प्रस्ताव को हम विकल्प के रूप में रख सकते हैं, ये ताक़त बढ़ा। आज की स्थिति में कोई विकल्प प्रस्तुत कर दिया जाए ये इतना आसान तो नहीं है। तो महत् पुण्य का ही प्रताप होगा ऐसा मैं सोचता हूँ। वो महत् पुण्य जो है किसी का आशीर्वाद ही है। उसको हम माना हूँ मानव पुण्य के आधार पर ये घटित हुई। मानव का ज़रूरत रहा इसी लिए घटित हुई। मानव पुण्य वहाँ तक विकसित हो चुकी है इसी लिए घटित हुई, ऐसा मैं कह रहा हूँ।
तो निष्कर्ष निकला कि वो अनिश्चित गम्य्स्थली की साधना करके इसको हम प्रमाणित करेंगे ऐसा कभी हो ही नहीं सकता, उसके लिए हम कोई उपदेश दे नहीं पाएँगे। हम ये निश्चित ठोक बजाऊ विधि से कहूँगा कि पूरा का पूरा सच्चाई को हम शब्द के रूप में प्रस्तुत किया हूँ किताबों में, आपके लिए सूचना है, उस सूचना के आधार पर आप में सत्य के प्रति जिज्ञासा होता है तो हम आपको अध्ययन कराएँगे, अध्ययन से आपको सत्य को बोध कराएँगे, बोध कराने के बाद आप में स्वयं ही उसको प्रमाणित करने की तीव्र संकल्प होगी, फलस्वरूप अनुभव मूलक विधि से प्रमाणित होगी। इसको हमने देखा है, ये सभी मनुष्य के साथ रखी हुई एक सुविधा है। कितना बढ़िया है। एक आदमी के साथ नहीं है ये, एक मूरख के साथ भी वैसा ही है, ज्ञानी के साथ भी वैसा ही है, विज्ञानी के साथ भी वैसा ही है। इससे क्या पता चला कि विज्ञानी को भी उतना ही ध्यान देना पड़ेगा। हम विज्ञानी हो गए हैं हमको कम ध्यान देने से हो जाएगा, झूठ है, यह होने वाला नहीं है, बल्कि और भी ज़्यादा ध्यान देना पड़ेगा। ज़्यादा confusion है तो आदमी को ज़्यादा ध्यान देना पड़ेगा। कम confusion वाला आदमी कम ध्यान देने पर भी चलेगा। अभी ज़्यादा पढ़ा, ज़्यादा confusion। ज़्यादा पढ़ा मानसिक रूप में ज़्यादा टुकड़ा बना रहता है और कम पढ़ा कम टुकड़ा बना रहता है।
जिज्ञासा: वो प्रश्न रह गया, आपको शिव का साक्षात्कार हुआ था, वो क्या घटना है?
उत्तर: शिव का साक्षात्कार हुआ होगा तो साकार ही का हुआ होगा। किसी बात का आप साक्षात्कार कहोगे वो सब प्रकृति ही है। प्रकृति का आकर बनाना हमारा मानसिक कला है। वो कला हमारा मन में बनता ही है और बिगड़ता भी है। तो हमको थोड़ा देर तक ज़्यादा रह गया इसलिए साक्षात्कार माना, इसको आप कोई भी नाम दे दीजिए। मनाकार स्थिर होने से हम साक्षात्कार मानते हैं, मनाकार स्थिर ना होने से हम साक्षात्कार नहीं मानते।