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भाग – 14

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जिज्ञासा: अनुभव दर्शन क्या चीज़ है? 

उत्तर: अनुभव दर्शन का यही मतलब है- जो समझ होता है, सहअस्तित्व में अनुभव होना। समझदारी का सम्पूर्णता है- सहअस्तित्व समझ में आना। सहअस्तित्व समझ में आने से क्या होगा- विकास क्रम अनुभव में आना, विकास अनुभव में आना, और जागृति क्रम अनुभव में आना, जागृति अनुभव में आना। यही अनुभव में आने वाली चीजें हैं। यही चारों जगह के अनुभव होने के पश्चात इसी के साथ नियम, नियंत्रण, संतुलन, न्याय, धर्म, सत्य- ये छः चीज़ अनुभव में आता है। यह नियम पूर्वक है, यह सत्य पूर्वक है, ये सब हमको समझ में आता है। उसके लिए कहा है स्थिति सत्य, वस्तु स्थिति सत्य, वस्तुगत सत्य के रूप में पूरा का पूरा व्याख्यायित हो जाता है। तो इस ढंग से हम एक अच्छी स्थिति में आ सकते हैं कि समझदारी को यदि समझाने वाला परम्परा बनता है। अभी एक तरफ यांत्रिकता को समझाने वाली बात हुई, दूसरी तरफ़ एक रहस्य को समझाने की बात हुई परम्परा में। अभी हम सहअस्तित्व को समझाने के लिए तैयार हुए हैं और सहअस्तित्व में विकास क्रम विकास और जागृति क्रम जागृति को समझाने योग्य हम हुए हैं, ये अधिकार संपन्नता हमारे पास है। इसके आधार पर आदमी को पूरा समझदार बनाने की उम्मीद रखते हैं। इन उम्मीदों को हम प्रयत्न कर रहे हैं, उसमें कुछ दूर तक चले हैं, कुछ दूर चलना बाकि है। तो इस ढंग से अपना गति बनी हुई है। इसको  पूरा का पूरा समझा ले जाने के बाद आदमी अपने में अनुभव मूलक विधि से ही जिएगा, दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है। अनुभव गामी विधि से हम यदि अध्ययन कराते हैं, अनुभव मूलक विधि से ही प्रमाणित होना बनता है। ऐसा विधि को हम अपनाए हैं। इसी को हम कहते हैं “अनुभव दर्शन”। अनुभव के रूप में जिया, जीने का नाम है दर्शन। दर्शन का मतलब बातचीत नहीं है, जीना दर्शन है। दृश्य के रूप में होना ही एक दर्शन का आधार है। दृश्य क्या है जीना है, होना है।  मनुष्य के साथ होना भी है, जीना भी है। जीने के रूप में मनुष्य यदि मिलता है, होने के रूप में है ही, इसको हम पहचानते ही हैं, जीने के रूप में यदि प्रमाणित होता है, जागृति कहलाता है। इसके पहले यदि कोई चीज़ हो सकता है तो, मनुष्य समझ सकता है, यदि बता नहीं पाता है तो बात अलग है, उसको दृष्टा पद कहा। इस ढंग से विगत में कोई समझे होंगे वो दृष्टा पद में हो करके ही गये हैं। हमको प्रमाण रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाए हैं, यदि पहले ज्ञानी हुए होंगे, नहीं हुए हैं इसका तो दावा हम कर नहीं सकेंगे, अभी तक प्रमाण तो नहीं मिली थी। ज्ञान का प्रमाण अभी  मध्यस्थ दर्शन ही प्रस्तुत किया है। ज्ञान दूसरों तक पहुँचाने की बात है। ज्ञान का मतलब व्यवस्था, अखंडता सार्वभौमता अक्षुणता इस प्रकार की वैभव सम्पन्न है ज्ञान। ज्ञान कैसा वैभव है- अक्षुणता, सदा सदा के लिए ज्ञान, और व्यवस्था के रूप में वैभव, अखंडता के रूप में वैभव। ये वैभव के तीन आयाम, ये अपने

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