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भाग – 13
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अभी हम इस बात पर ध्यान दिए थे कि अभी आगे चल कर के संसार, जो समाधि संयम का जिक्र किया, उस पर लोग जाना पड़ेगा या नहीं जाना पड़ेगा। इस बात पर हम चर्चा किये। उसमें जितने भी मेरे अनुभव को बताया है, उसके अनुसार, मानव को एक घटना क्रम में है ये समाधि, संयम। घटना के रूप में घटित होता है और यह क्रम नहीं है। इस क्रम से ये घटित हो जाएगी, ऐसा Guaranty कुछ भी नहीं है। किसी को हो भी सकता है, किसी को नहीं भी हो सकता। अरबों वर्ष में भी नहीं हो सकती है, एक ही क्षण में भी हो सकता है। ऐसी अनिश्चयता जुड़ी हुई है इसके साथ। इसके मूल वस्तु में हमने यही पहचाना है, समाधि के लिए मूल तीव्र जिज्ञासा कुछ होने की आवश्यकता, वो अज्ञात से ही सम्बंधित बात होना चाहिए मेरे अनुसार। अप्राप्ति से संबंधित बातों पर समाधि होगी ऐसा हमारा विश्वास नहीं है। अभी संयम में जितने भी बात लिखा है पतंजलि में, अप्राप्त को प्राप्त करने की है। वो सिद्धि से सम्बंधित है, सिद्धि पाद ही लिखा है उसको। इन सबको देखने पर हमको लगता है कि अज्ञात को ज्ञात करने के लिये संयम किसी ने किया नहीं होगा। समाधि में जो होता है उसी को ज्ञान मान लिया, उसी को गुड़ खाया हुआ गूँगा कह दिया, ऐसा मैं मानता हूँ। हो सकता है किसी को अच्छे बोध हो गया हो, उसके लिए तो हमारा कोई आक्षेप भी नहीं है। प्रमाणित नहीं हुआ ये हमारा सत्यापन है। ज्ञान प्रमाणित नहीं हुआ। किताबों में लिखा है, बुजुर्गों ने भी मुझको जो बताया है ये अनिर्वचनीय है, अव्यक्त है यही बताया। जबकि ज्ञान जैसा पावन चीज़ सब जगह में समान रूप में होने की बात पहले कहा- “सत्यम ज्ञानं अनंतं ब्रह्म”। तो ज्ञान जब सब जगह में नहीं है तो और क्या रहेगा। इस बात पर हमारी जिज्ञासा हुई थी, उसका उत्तर हमें मिल गया। मिल जाने के बाद अभी हमारा सत्यापन यही है, कि मनुष्य को समाधि के लिए प्रयत्न करना कोई निश्चित ज्ञान के लिए नहीं होगा। निश्चित ज्ञान के लिए अध्ययन विधि ही होगा और परम्परा में से ही होगा। परम्परा के लिए अनुसंधान, शोध दोनो प्रसिद्ध हैं। शोधपूर्वक कुछ जोड़ा जा सकता है, अनुसंधान पर कुछ जोड़ा जा सकता है। ये मेरा अनुसंधान है, तीन बात की अनुसंधान की बात किया है- श्रम, गति, परिणाम के साथ हम गठन पूर्णता, क्रिया पूर्णता, आचरण पूर्णता को अनुसंधान रूप में प्रस्तुत किया है। यह ज्ञान हो जाने से मानव सटीकता से जी पाता है। इस ढंग से क्या हुआ- समझदारी के लिए, अध्ययन के लिए ध्यान देना पड़ेगा और अनुभव के पश्चात ध्यान रहता ही है।
जय हो मंगल हो कल्याण हो।