धातुओं को हम कैसे भी प्रयोग किया वो पुनः उतना बन रहा है उसका प्रमाण अपने को नहीं मिल रहा है। वैसे ही सभी धातुएँ हम उपयोग करते हैं उतना बन रहा है उसका गवाही हमारे पास नहीं है। हम ये कह रहे हैं ये जो नहीं भी मिल रहा है ऐसे धातुओं के बारे में धरती अपने गर्भ में ना रखते हुए बाहर कर दिया है, जैसा अपने पेट से बाहर कर दिया टट्टी पेशाब के रूप में, वो तो खाद होना ही है, उसको हम उपयोग करें, धरती के surface में मिलता है उसको उपयोग करें। धरती के भीतर से निकालने के कार्यक्रम को बंद करे दें। ये अपने को आवर्तनशीलता लगती है। और दूसरा लोहा जैसा सोना जैसा वस्तु को हम बारम्बार उपयोग करते रहें। जैसा सोना है उसको सही ढंग से यदि सोचा जाये कितने भी बार बनाओ वो सोना ही रहेगा। लोहा भी वैसा ही रहेगा, कैसा भी उपयोग करो, लोहा ही रहेगा इस ढंग से हम लोहा को कई बार उपयोग कर सकते हैं। लोहा में कीट लक्षण मानते है, उसमें कीट लगता है, वह थोड़ा सा कम होता है। सोना में तो कीट प्रवृति कम है न्यूनतम है। सोना में चाँदी में कम है, लोहा में कुछ ज़्यादा है माना जाता है। उसके बावजूद भी लोहा को कई बार हम उपयोग कर सकते हैं। इस प्रकार की प्रवृति पैदा करना चाहिए। लोहा किस के लिए पैदा किया- रेल पटरी के लिए प्रधान रूप में और पक्का मकान के लिए, cement वाला सड़क के लिए उपयोग किया। प्रधान बात यही है, पक्का मकान चाहिए, लोहा चाहिए, पक्का सड़क चाहिए, लोहा चाहिए रेल पटरी चाहिए, लोहा चाहिए। तो इस प्रकार से हम रेल को दौड़ाना है रेल पटरी चाहिए, इस बात को पहचाना है। वो बड़ा अच्छा है। ऐसे बना कर रखने के लिए जो रेल पटरी घिसते हैं उसको पुनः रेल पटरी बना लिया जाए। वो कर नहीं रहे हैं। उसको side में रख देते हैं वो कीट पकड़ करके मिट्टी होता है, उसका कोई उपयोग नहीं कर रहा है। कर रहा है तो कोई उठा कर कबाड़ में दो पैसे में बेचता है और ख़रीदने वाला उसका कुछ भी उपयोग कर लेता है। उसका उपयोग निश्चित होने की आवश्यकता है। उसको पुनः रेल की पटरी बनी हुई चीज़ पुनः रेल की पटरी ही बनकर रेल के पास चली जाए। अभी जितना भी धरती पर जो लोहा को पाया जाता है, कई जगह में पाया जाता है। वो धरती पर पाया जाने वाला लोहा कम से कम हज़ार दो हज़ार दस हज़ार वर्ष तक पर्याप्त है या और ज़्यादा ही चलने वाला है यदि आवर्तनशीलता मिलाते हैं, बहुत दिन तक चलने वाला है। और मानव यदि मानव चेतना में परिवर्तित होता है, पक्का मकान की ज़रूरत नहीं है। अभी सारा पक्का मकान की सोच केवल अमानवीयता के आधार पर पक्का मकान का सोच है। मानवीयता के आधार पर पक्का मकान वाला सोच भी धीरे-धीरे शिथिल होगी। पक्का सड़क, cement का रास्ता बनाना, ये भी एक प्रकार की आदमी की बड़ी उम्मीद है क्योंकि लोहा हमारे पास बहुत है, इसलिए हम पक्का सड़क बना लेंगे। ऐसा भी सोचते हैं। तो उसका भी कई देशों में प्रयत्न हुई है और हमारे देश में भी कहीं-कहीं हुआ होगा। मैसूर और बैंगलोर के बीच में cement की सड़क बनायी है, ये सारे बात देखा ही है, उसमें reinforcement लगता ही है। ये सब बात को देखा है। इसको आवर्तनशीलता में लाने की ज़रूरत है। लोहा जब अपने में त्राणहीन होता है तो उपयोगी नहीं हो पता है, उस लोहा को पुनः लोहा बना कर पुनः उपयोग करने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसमें आवर्तनशीलता है ना। जैसे हम जंगल से बांस लाए काग़ज़ बनाए इतना सब काग़ज़ बटता है, दिन में हजारों टन, लाखों टन पेपर बटता है पूरी धरती में, करोड़ों टन कहने से भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वो सारे पेपर को निश्चित रूप से वापस लाने की बात होना चाहिए। उसको पूरा पेपर को वापस बनवा करके उसको पुनः reuse करना चाहिए। पुनः उसके लिखा हुआ स्याही को खतम कर दिया, पुनः pulp ही है वो, पुनः काग़ज़ बना लिया, कर लिया उपयोग। इसको आसानी से कर सकते हैं कि नहीं? recycling कर सकते हैं कि नहीं? कर सकते हैं। इस प्रकार से बांस काटने वाला जंगल काटने वाला आवश्यकता कम होगा। उसके बाद आता

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