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भाग – 15
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उत्तर: व्यवहारात्मक जनवाद का ये मतलब है कि मनुष्य जो कुछ भी व्यवहार करता है, एक दूसरे के साथ कुछ ना कुछ मानता है, स्नेह करेगा या द्वेष करेगा। या तटस्थ, एक और भाषा प्रयोग किया है हमारे यहाँ बुजुर्गों ने। तीन भाषा प्रयोग किया। मैं समझता हूँ विरोध का ही एक भाषा है- तटस्थ। इस ढंग से मानने से स्नेह होगा नहीं तो विरोध ही होगा। स्नेह पूर्वक जीने पर हमको ऐसा लगता है एक दूसरे के बीच में विश्वास है। स्नेह यदि टूटा हुआ दिखता है तो हमारे परस्परता में विश्वास नहीं है। व्यवहारात्मक जनवाद को पूछा ना आपने? तो व्यवहार में हम न्याय पूर्वक जीने के लिए संवाद करें, समाधान पूर्वक संवाद करें, समाधान पूर्वक जीने का संवाद करें। जब कभी भी हम संवाद शुरू करते हैं, समाधान को आधार मान कर समाधान के आधार पर कैसे हम जिएंगे इस बात पर हम संवाद करें। जैसा college में, school स्कूल में, बच्चों से संवाद कराया जा सकता है, व्यवहार में हम समाधान पूर्वक कैसा जीएँगे, इस मुद्दे पर संवाद करना। इससे क्या होगा? इससे बच्चों में एक मानसिकता तैयार होगी धीरे- धीरे, कि संवाद से हमको ऐसा जीना है। हमको न्याय पूर्वक कैसे जीना है, नियमपूर्वक कैसा जीना है, नियंत्रण पूर्वक कैसे जीना है, और संतुलनपूर्वक कैसा जीना है और समाधान पूर्वक कैसे जीना है सत्यपूर्वक कैसे जीना है। ये छह मुद्दे पर संवाद करवाया जाए, इसका नाम दिया है व्यवहारात्मक जनवाद। व्यवहारात्मक जनवाद में हम व्यवहार करते समय में इन चीजों को कैसे प्रमाणित करेंगे इस पर संवाद करना, इसके लिए सलाह दिया है।
जिज्ञासा: आवर्तनशील अर्थ शास्त्र क्या है?
उत्तर: मनुष्य अभी जितने भी प्राकृतिक वैभव को, यानी खनिज वनस्पतियों को उपयोग करता है, एक कच्चा माल के रूप में उस पर सोचने की मुद्दा है। दूसरा, मनुष्य के साथ व्यापार करता है। दो मुद्दा हुआ, एक मुद्दा खनिज वनस्पतियों को उपयोग करने का मुद्दा दूसरा मुद्दा व्यापार करने का मुद्दा, दो पर विचार करने की मुद्दा है। इसमें आवर्तनशीलता का क्या मतलब है। इसमें आवर्तनशीलता का मतलब ये है प्रकृति में उन्हीं वस्तुओं को हम उपयोग करें, आहार, आवास, अलंकार, दूरदर्शन, दूरगमन, दूरश्रवण के रूप में उपयोग करने के लिए, जो पुनः जितना हमने उपयोग किया उतना प्रकृति उसको बनाता हो। सबसे अच्छा बात वही है। अभी वनस्पतियों में तो ये पता लगता है, हम कुछ भी उपयोग करेंगे वो multiply होता रहता है, वो बनता रहता है, ऐसा पता लगता है। जबकि खनिजों को हम उपयोग करते हैं वो पुनः बन रहा है ऐसा हमको प्रतीत नहीं होता। जैसा- लोहा उपयोग करने के बाद लोहा बन रहा है ऐसा कुछ प्रतीत नहीं होता। वैसे ही ताम्बा, सोना जितने भी धातुएँ और विकिरणीय धातुएँ हैं। विकिरणीय