आप से आता है। अक्षुणता आता है तो सार्वभौमता आता ही है। सार्वभौम व्यवस्था आता ही है। समझदार परम्परा होने के बाद सार्वभौम व्यवस्था बनता ही है। अखंड समाज को बनाए रखने के लिए सार्वभौम व्यवस्था ही एकमात्र गति है। दूसरा कोई गति बनता भी नहीं। इस ढंग से हमने प्रस्तुत किया है। इस ढंग से कहाँ पहुँचे, अनुभव का मतलब क्या हुआ- अनुभव का मतलब सहअस्तित्व समझ में आना, अनुभव होना, प्रमाणित होना और सहअस्तित्व में ये चारों चीज़ समझ में आना। विकास क्रम, विकास, जागृति क्रम, जागृति समझ में आना, अनुभव होना और प्रमाणित करना। इतना ही तो अनुभव दर्शन का मतलब है। इसके इस मतलब को हमने अनुभव दर्शन में स्पष्ट किया है। उसको अध्ययन करने से यह बोध हो सकता है।
जिज्ञासा: बाबा समाधानात्मक भौतिकवाद का क्या मतलब है?
उत्तर: समाधानात्मक भौतिकवाद के बारे में ये लिखा है- भौतिक, रासायनिक वस्तुएँ, ये समाधान के रूप में हैं, समस्या के रूप में नहीं हैं। पहला चोट ये है। कैसे समाधान के रूप में है- मनुष्य नियम, नियंत्रण, संतुलन के रूप में रहना के रूप में समाधान है। हर वस्तु अपने त्व सहित व्यवस्था है, समग्र व्यवस्था में भागीदारी करता है। इससे पता लगता है, नियम, नियंत्रण, संतुलन पूर्वक है। इसका गवाही कहाँ मिला- त्व सहित व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी। लोहा में लोहत्व होता है, इसमें मनुष्य को कहीं भी संदेह नहीं है। यदि भारत में लोहा है, उसको अफ़्रीका वाला भी विश्वास करता है। भारत के आदमी के साथ अफ़्रीका वाला विश्वास नहीं करेगा, अफ़्रीका के आदमी के साथ भारत वाला विश्वास नहीं करेगा। लंदन में रहने वाले कुत्ते का भारतीयों को भी विश्वास है कि यह कुत्ता है और लंदन के लोगों को भी भारत में रहने वाले कुत्ते का विश्वास है कि कुत्ता है। किंतु लंदन में आदमी है इसके साथ विश्वास हो, ऐसा हुआ नहीं। भारत में आदमी है, आदमी के साथ विश्वास हो ऐसा घटित हुआ नहीं। इसका प्रमाण इतिहास है। मार काट है, मार दहाड़ है। तो विश्वास करना अभी तक नहीं बना। यह तो देश देश की बात हुई, हमारा ही देश में एक आदमी से दूसरा आदमी अभी तक कितना विश्वास कर पाया है, इसको पूछोगे, इसको अध्ययन करोगे काफ़ी परेशानी है। उसके बाद इससे ज़्यादा दुखद कथा परिवार में कितना हम विश्वास किए। ये सब सोचने की मुद्दा है। ये मुद्दे पर सभी को कहीं न कहीं घायल होने की स्थिति बना ही है। इस सब को ठीक करने की विधि यही है, मनुष्य-मनुष्य के साथ विश्वास अर्जन होना अनुभव मूलक विधि से ही होगी। जब हम स्वयं में विश्वास कर पाते हैं तब परिवार में विश्वास होगी, परिवार में विश्वास होगा तो अड़ोस पड़ोस में विश्वास होगा, अड़ोस पड़ोस में विश्वास होगा तो देश धरती में विश्वास होगा, ऐसा विधि बनी हुई है। इस आधार पर भौतिक वस्तुओं को हम व्यवस्था के रूप में देखते हैं। हम स्वयं व्यवस्था के रूप में जीने के लिए प्रेरणा पाते हैं उसमें ज़्यादा से ज़्यादा यौगिक विधि से पाते हैं। एक दूसरे के साथ मिलना है, गुणात्मक परिवर्तन का आधार को यौगिक विधि से पाते हैं। तो उस आधार पर हम एक दूसरे के साथ मिल कर गुणात्मक परिवर्तन को कैसे प्रमाणित किया जाए उसके बारे में हम सोच सकते हैं, उसक लिए ही ये प्रस्ताव है। मानव-मानव के बीच मानवत्व नाम की एक महा सेतु है इसके आधार पर एक दूसरे को पहचान सकते हैं, विश्वास कर सकते है, व्यवहार कर सकते हैं, कार्य कर सकते हैं, व्यवस्था में जी सकते हैं, अखंड समाज के रूप में पहचान सकते हैं, उसके अनुसार सूत्र व्याख्या को प्रस्तुत कर सकते हैं। ये समाधानात्मक भौतिकवाद का मतलब है।