है जंगल से ईंधन, इस प्रवृति को कम करना। उसके लिए क्या है सूर्य ऊर्जा। सूर्य ऊर्जा को सस्ता बनाना, घर-घर में सूर्य ऊर्जा को पहुँचना। सूर्य ऊर्जा से खाना बनना, और घर का प्रकाश होना। ये दो चीज़ के लिए बहुत अच्छी तरह से प्रयोग कर ही सकते हैं। उसी के सहायता में गोबर गैस भी प्रयोग कर सकते हैं। ये दो के आधार पर अच्छे से कर सकते हैं। उसके साथ-साथ जहाँ कहीं भी वायु तरंग रहता है, उसमे वायु तरंग के आधार पर भी यहाँ मदद कर सकते हैं। उस ढंग से ऊर्जा संतुलन के ओर ये तीन प्रकार के स्रोत को प्रयोग करने की आवश्यकता है। यदि ये कर पाते हैं, इसमें आवर्तन शीलता है। हवा चला पुनः भी चलता है। गोबर गैस-आज गोबर डाला, गैस बना। पुनः डालेंगे, पुनः बनता है। ये आवर्तनशील है। उसके बाद सूर्य ऊष्मा, सूर्य ऊष्मा सदा-सदा perennial है वो ठंडा होते तक।
एक आदमी लिखा है आज के पेपर में ५० करोड़ वर्ष के बाद सूर्य बढ़ने शुरू करता है और बढ़ते-बढ़ते सूर्य अपने में धरती को निगल लेगा, ये आदमी पढ़ा। जबकि कितना अरब वर्ष से सूरज वहाँ बैठा है, मानता है वो पता नहीं। ऐसा सिर पैर बिना बात बहुत सारे सुनते हैं हम। ये विज्ञानी ही कहते हैं। कोई विज्ञानी ही कहा है। ये सब बातें सोचने की मुद्दा है। सूर्य कितने भी अरब वर्ष से हो या लाख वर्ष से हो वो यथावत् बना ही है।
उसको ऐसा माना जाता है, यही Fission fusion वाले, उस धरती पर आयी जो civilisation है, उसको खतम करके, सूर्य धरती के रूप में रहा हुआ स्थिति को वो महताब जलाकर चले आए धरती में, अभी वही काम यहाँ करने के लिए तैयार बैठे हैं। गवाहित है कि नहीं है? ये स्पष्ट है कि नहीं है? ऐसा सोचने से क्या तकलीफ़ है? ये जैसा एक आदमी लिखा है उसको पढ़ते ही हैं, ऐसा सोचने से क्या तकलीफ़ है? ऐसा भी सोच सकते हैं ना। गवाही तो अपने पास नहीं है ना उनके पास है जो लिखा है। वो भी कल्पना करते हैं, हम भी कल्पना कर सकते हैं। ऐसा बात हो सकता है।
जिज्ञासा: सूरज क्या कभी ठंडा नहीं होगा क्या?
उत्तर: ठंडा होने की ओर जा रहा है कई लोग लिख चुके। आज कोई लिखा है सूरज बढ़ने लगा है इतने वर्ष बाद धरती को निगल लेगा। मैं कह रहा हूँ ठंडा होगा। और पहले से अभी सूरज अपने में किसी न किसी micro level में ठंडा हो चुका है। जितना विस्तार में उसका gases था( सूर्य बिंब में) वो थोड़ा सा १-२ इंच कम हो चुका है। ऐसा मैं कल्पना करता हूँ, यह धीरे-धीरे होकर के भारी परमाणु बनेगी। उसके बाद गठन होना होता है स्वाभाविक है। ये सभी धरती का हालत है। अभी जैसा ब्रहस्पति पूरा का पूरा material हवा के रूप में ही है। अभी जो एक धूमकेतु उसमें घुसा ना वो भी धूली था ये भी धूली था सब मिल लिए। बात पूरा हो गया। पहले prediction किए इसमें से इतना ऊर्जा निकलेगा, इतना ऊर्जा निकलेगा वो तांडव होगा, वो होगा, ये होगा। वो सब हो गया, उसके बाद चूँ चपट नहीं किए।