• प्रत्येक इकाई का स्वभाव गति में वैभव है।
  • प्रत्येक भौतिक-रासायनिक क्रिया श्रम, गति, परिणाम का अविभाज्य वर्तमान।
  • श्रम और परिणाम के संयुक्त रूप में गति है।
  • गति और परिणाम के संयुक्त रूप में श्रम है।
  • श्रम और गति के संयुक्त रूप में परिणाम है।
  • क्रिया = श्रम, गति, परिणाम - भ.व. 49 – 51

सत्ता में संपृक्त प्रकृति ऊर्जा सम्पन्न बल सम्पन्नता क्रम में क्रिया के रूप में व्याख्यायित है। क्रिया श्रम-गति-परिणाम का संयुक्त रूप ही है। इसलिए मानव अध्ययन कर सकता है। सत्ता स्थिति पूर्णता के रूप में अर्थात् सर्वदा व्यापक पारदर्शी-पारगामी के रूप में ही विद्यमान है। इसलिए इसे स्थितिपूर्ण नाम है। ऐसी स्थितिपूर्ण सत्ता में अनंत इकाइयों के रूप में अथवा अनगिनत एक-एक के रूप में स्थितिशील प्रकृति सहज जड़-चैतन्य रहना दृष्टव्य है। यही अस्तित्व स्वयं सह-अस्तित्व होने का प्रमाण है। पूर्ण में संपृक्त प्रकृति, पूर्णता में गर्भित होना (पूर्णता का आशय सम्पन्न रहना) इस प्रकार से देखा जा सकता है कि प्रत्येक परमाणु अंश एक-दूसरे को पहचानते हैं। इसका प्रमाण निश्चित अच्छी दूरी में है। इतना ही नहीं, निश्चित कार्य और आचरण करते हैं। इसके आगे प्रत्येक परमाणु दूसरे परमाणु को पहचानते हैं। इसका प्रमाण अणुओं के रूप में परमाणुओं का होना स्पष्ट है।

यथा परमाणु-अंश एक दूसरे के साथ निश्चित दूरी, निश्चित कार्य, निश्चित फलन के साथ-साथ परमाणु गठित होता है। इसके मूल में सह-अस्तित्व रूपी अस्तित्व में ऊर्जा-सम्पन्नता, बल-सम्पन्नता का स्वरूप स्पष्ट किया जा चुका है। इसी आधार पर परमाणु सहज क्रियाकलाप का मानव अपने भाषा में अपने ही दृष्टापद प्रतिष्ठा के अनुरूप व्यक्त करने पर जितने भी परमाणु अंश परमाणु में कार्यरत हैं, वे सब एक दूसरे को पहचानते हैं। प्रत्येक परमाणु गतिपथ और गति पथों सहित कार्यरत रहना, निर्वाह करने का द्योतक है। इस प्रकार प्रत्येक परमाणु अंश पहचानने और निर्वाह करने का प्रवर्तन सम्पन्न रहता है। इसका गवाही यही है, सभी परमाणु अंश किसी न किसी परमाणु गठन में ही कार्यरत रहते हैं। किसी परमाणु अंश गठन से बाहर यदि दिखते हैं अथवा मानव घटित करता है, पुन: वे सब मिलकर परमाणु के रूप में गठित होने के प्रयास में रहते हैं अथवा किसी परमाणु में समावेश होने के प्रयास में रहते हैं। परमाणु अंश से ही पहचानने, निर्वाह करने का क्रियाकलाप, तद्नुसार निरीक्षण-परीक्षण पूर्वक सर्वेक्षित होता है।

एक से अधिक परमाणुओं के गठन को हम अणु कहते हैं। मूलत: परमाणु ही अणु रचना करते हैं। सभी प्रकार के अणु अपने-अपने सजातीय परमाणुओं से रचित रचना है। सम्पूर्ण अणु स्वरूप को एक ही प्रजाति के परमाणुओं से रचित रचना के रूप में अणुओं को देखा जाता है। अणु के अनन्तर ही सजातीय-विजातीय अणु संयोग, बड़ी-छोटी भौतिक रचनाएँ होती हैं। यथा धरती-ग्रह-गोल जैसी बड़ी-बड़ी रचनाएँ होती हैं और विभिन्न धातु, विभिन्न प्रकार के पत्थर, विभिन्न प्रकार की मणियाँ, विभिन्न प्रकार की मिट्टी के रूप में रचनाएँ हुई।

ये सब सह-अस्तित्व सहज पूरकता उपयोगिता विधि से गठित हुई हैं। एक से अधिक परमाणु अंशों का एकत्रित होना सह-अस्तित्व का ही नित्य प्रभाव है- महिमा है क्योंकि अस्तित्व ही सह-अस्तित्व है। इस विधि से एकदूसरे को पहचानना, साथ में होना, के स्वरूप को अथवा शुद्घ सह-अस्तित्व के स्वरूप को अणु-रचना पर्यन्त शुद्घ तात्विक वस्तु के रूप में देखा जाता है। – अ.श. 75–77

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