अध्याय 1: भूमिका

1.1 मानव - वैचारिक इतिहास

सुदूर विगत से ही अध्यात्मवादी, अधिदैवीयवादी और अधिभौतिकवादी विचार मानव-मानस में स्मृति और श्रुति के रूप में हैं। कल्पनाओं-परिकल्पनाओं के आधार पर वाङ्मय रचना बहुत सारा हुआ है। इसमें अनेकानेक मानव ने भागीदारी का निर्वाह किया घोर परिश्रम किया। इसी क्रम में घोर तप, योगाभ्यास, यज्ञ, दान के रूप में भी अपने-अपने आस्थाओं के साथ जीकर दिखाया अथवा करके दिखाया। इन्हीं सब कृत्यों को आदर्शवादी कृत्य भी मानते आये हैं। क्योंकि ये सब कृत्यों को सब नहीं कर पाते थे। न करने वाले के लिए, करने योग्य कृत्यों के रूप में सभी प्रकार के धर्म ग्रंथ बताते आये। ये सब करने के उपरांत भी अध्यात्म, देवता और ईश्वर ये सब रहस्य में ही रहे। रहस्य की परिभाषा है - हम मानव जो कुछ जानते नहीं हैं वह सब रहस्य होना समीक्षित हुआ। इस विधि से नहीं जानते हुए मनवाने के जितने भी प्रयास हुए वह सब आस्थावादी कार्यकलाप के रूप में गण्य हुआ। आस्था का परिभाषा ही है नहीं जानते हुए किसी के अस्तित्व को स्वीकार करना। यह सर्वविदित है।

ईश्वर, अध्यात्म और देवी-देवता के अधीनता में ही जीव जगत होना वाङ्मयों में बताया गया है। अनजान घटनाओं की व्याख्या करने के क्रम में जीव-जगत अध्यात्म, देवी-देवता और ईश्वराधीन है इसके समर्थन में बहुत कुछ लिखा गया है। इन सभी प्रयासों का महिमा सहित अर्थात् बहुत सारे साधनों को नियोजित करने के उपरांत भी अध्ययन विधि से कोई प्रमाण, अनुभव विधि से कोई प्रमाण, प्रयोग विधि से कोई प्रमाण और व्यवहार विधि से कोई प्रमाण मिला नहीं। जबकि कोई मानव रहस्य को वरता नहीं। आस्था के आधार पर अपने कल्पनाशीलता के अनुरूप रहस्य को सजाने गया वही वाङ्मय का स्वरूप बना। इसका आधार केवल मानव सहज कल्पनाशीलता-कर्म स्वतंत्रता ही है और मानव कर्म करते समय स्वतंत्र, फल भोगते समय परतंत्र रहा।

इस समीक्षा को यहाँ इसीलिये प्रस्तुत किये हैं कि हर मानव सत्य, समाधान, व्यवस्था, न्याय, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व को प्रमाणित करना चाहते हैं। हर मानव जन्म से ही सत्य वक्ता होता है इसलिए सत्य बोध होने की आवश्यकता है। भौतिकवादी और आदर्शवादी विधि से सत्यबोध होना मानव जाति के लिए प्रतीक्षित है। इसलिए सर्वतोमुखी समाधान और न्यायबोध होना अभी तक प्रतीक्षित है, अर्थात् 20 वीं शताब्दी के दसवें दशक तक प्रतीक्षित है। विक्रम शताब्दी के अनुसार 2052 आषाढ़ मास तक प्रतीक्षित है। इसी सर्वेक्षण, निरीक्षण और परीक्षण के आधार पर ‘‘अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’’ की आवश्यकता को पहचाना गया।

रहस्यमय और सुन्दर कल्पना के आधार पर अर्थात् मनलुभावन विधि से वाङ्मयों में मोक्ष और स्वर्ग की कल्पनाएँ प्रस्तुत की गई है। जहाँ तक मोक्ष की बात है अध्यात्म विधि से ऐसा बताया गया है कि जीवों के हृदय में आत्मा रहता है। वह आत्मा ब्रह्म में अथवा परमात्मा में विलय हो जाता है। इसके लिये ब्रह्म ज्ञान ही एकमात्र शरण स्थली बताया गया। कुछ प्रणेताओं का कहना है यह एकांत विधि से संभव है और कुछ प्रणेताओं का कहना है घोर तप से, कुछ प्रणेताओं का कहना है योगाभ्यास से, संघ के शरण में जाने से, और कुछ प्रणेताओं का कहना है योग और संयोग से, होता है।

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