अध्याय 8: वाङ्मय एवं अध्ययन

8.1 मध्यस्थ दर्शन वाङ्मय

दर्शन (अनुभव बल)

दृष्टि से प्राप्त समझ, अवधारणा और अनुभव ही दर्शन है। दर्शक-दृष्टि के द्वारा दृश्य को यथावत समझना और उसकी अभिव्यक्ति सम्प्रेषणा व प्रकाशन क्रिया। (प.स., 88)

मूलत: दर्शन, सह-अस्तित्व मूलक, मानव-केन्द्रित चिंतन होने के कारण, रहस्य का समापन, वर्तमान में, सम्पूर्ण प्रमाण सहज सुलभ हो गया। यह प्रमाण, प्रयोग, व्यवहार व अनुभव में प्रमाणित होता है। यह अध्ययन गम्य होता है। - म.वि. 131–132

वाद (विचार शैली)

जहां तक सह-अस्तित्व वादी विचार शैली है, वह विगत से आयी तर्कों और विसंगतियों लक्ष्य, समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेदारी में विरोधाभास को दूर कर देती है। साथ ही विज्ञान (विश्लेषण का तात्पर्य कालवादी, क्रियावादी, निर्णयवादी तथ्यों को स्पष्ट करना) सम्मत विवेक (प्रयोजन) तथा विवेक सम्मत विज्ञान-विधि से पूरी विचार शैली है। फलस्वरूप विसंगतियां दूर होती हैं। यह सह-अस्तित्ववाद है। जो अस्तित्व सहज है। यह अध्ययन के लिए समर्पित है। इसके मूल में जो दर्शन है, उसका नाम मध्यस्थ दर्शन रखा गया है। यह अध्ययन की मूल वस्तु है।

शास्त्र (जीने की कला)

परिभाषा - वर्तमान में विश्वास, मौलिक अधिकार पूर्ण विधि से मानव, मानव के साथ पहचाना गया। संबंध में मूल्य मूल्यांकन पूर्वक उभय तृप्ति, परिवार सहज आवश्यकता से अधिक उत्पादन में भागीदारी, मूल्य, चरित्र नैतिकतापूर्ण आचरणपूर्वक, व्यवस्था सहज प्रमाण को प्रस्तुत करते हुये समग्र व्यवस्था में भागीदारी व भागीदारी के प्रति सम्मति का सहज स्वरूप में प्रमाणित होना ही व्यवहारवादी समाज है; और शास्त्र का तात्पर्य शिक्षा-संस्कारपूर्वक ग्रहण योग्य सभी उपक्रम और कार्यप्रणाली है। इस प्रकार व्यवहारवादी समाज व शास्त्र का धारक, वाहक मानव ही होना स्पष्ट है। - स.श. 26

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