अध्याय 3. चैतन्य “जीवन”

मानव परिभाषा के रूप में ‘‘मनाकार को सामान्य आकांक्षा व महत्वाकांक्षा संबंधी वस्तुओं और उपकरणों के रूप में तन, मन सहित श्रम नियोजनपूर्वक साकार करने वाला, मन:स्वस्थता अर्थात् सुख, शांति, संतोष, आनन्द सहज अपेक्षा सहित आशावादी है।’’ – स.श. 132-135

3.1 मानव = शरीर + जीवन

(A) मानव शरीर रचना

ज्ञानावस्था की इकाई सह-अस्तित्व में केवल मानव है। ज्ञानावस्था का तात्पर्य ही है जीवन्त मानव शरीर रचना पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों सीमागत कार्यकलापों के अतिरिक्त तथ्य को उद्घाटित करना। मानव शरीर रचना गर्भाशय विधि से होना देखा गया है। गर्भाशय में भ्रूण रचना डिम्ब और शुक्र कीट संयोग विधि से होना भी ज्ञात हो चुका है। डिम्ब और शुक्रकीट मूलत: प्राण-कोषाओं में नीहित प्राण सूत्रों का ही रचना है। इस रचना में अर्थात् उभय कीट रचना संयुक्त रूप में ही शरीर रचना सूत्र रूप में स्थापित रहती है। इसी कारणवश उभयलिंगी (स्त्री व पुरूष शरीर) क्रम बना ही रहता है। इसका गवाही उभयलिंगी शरीर रचना होती है। इस प्रकार वंशानुषंगीय रचना मूलत: उभय कीट में समायी हुई शरीर रचना सूत्र पर आधारित रहना स्पष्ट है। इसी क्रम में मानव शरीर का भी रचना सम्पन्न हुआ रहता है। मानव शरीर रचना में अंतर यही है समृद्घिपूर्ण मेधस रचना रहता है इसी के आधार पर जीवन, जीवनी क्रम से आगे जागृति क्रम में आरूढ़ होता है। आदिकालीन मानव से अभी तक किये गये कृत्यों और परम्पराओं को देखने से यह साक्षित होता है। जागृति क्रम में आरूढ़ होने का साक्ष्य, शरीर को जीवन समझते हुए भी शरीर कृत्यों से तृप्त न होना, अव्यवस्था की समझ से पीड़ा होना, अन्याय और समस्या की पीड़ा से पीड़ित होना। एक भाग इन पीड़ाओं से विस्मृत होने के लिये प्रलोभनों-आस्थाओं को अपनाता हुआ देखा गया।

परंपरा के रूप में मानव बहुमुखी प्रवृत्तियाँ, कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता जैसी मौलिक स्वत्व के आधार पर फैलता ही गया। ऐसा विविध आयामों, दिशा, कोणों, परिप्रेक्ष्यों के क्रम में फैला हुआ परंपरा में, से, के लिये शिक्षा, संस्कार, संविधान, व्यवस्था दूसरे भाषा में समुदाय के संस्कृति, सभ्यता, विधि-व्यवस्था के रूपों में परंपराओं का होना देखा गया है।

मानव शरीर का संचालन भी जीवन ही सम्पन्न करने का तथ्य सुस्पष्ट है। मानव शरीर संचालन संस्कारानुषंगीय होने के अर्थ में ही बहुमुखी परंपराएँ देखने को मिला, यह केवल मानव परंपरा में ही मिला। इसमें यह भी देखने को मिला मानव ही अपने विभूतियों का सदुपयोग और दुरूपयोग कर सकता है। क्योंकि सम्पूर्ण मानव में शुभाकांक्षा उमड़ती ही रहती है। इन उमड़ती हुई शुभाकांक्षा ध्रुवीकृत होने के ओर ही सुदूर विगत से इस दशक तक किये गये प्रयास और अभिव्यक्तियों से इसी तथ्य की पुष्टि होती है। – आ.व. 92-94

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