टिपण्णी

इस संकलित पुस्तक में प्रयुक्त सभी परिच्छेद खंड श्री ए. नागराजजी (1920- 2016) द्वारा लिखित मध्यस्थ दर्शन प्रकाशित वाङ्मय से लिए गए हैं।

इस संकलन का आशय मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्वों, अथवा अध्ययन के बिन्दुओं से क्रमवत् अवगत होना है। यह आशा है की इस संकलन के माध्यम से मूल दर्शन वाङ्मय में प्रवेश सुलभ हो जायेगा। साथ में मुख्य तत्वों को सारांश करने में उपयोगी रहेगा ।

प्रत्येक परिच्छेद खंड के अंत में पुस्तक के नाम का चिन्ह एवं साथ में पृष्ठ क्रमांक दिया गया है। जैसे- “व्य. द. (184-186)। सम्बंधित वाक्यों के सन्दर्भ जानकारी के लिए इंगित पुस्तक को देखें। वाक्य क्रम के लिए न्यूनतम स्थानों पर संकलनकर्ता द्वारा कुछ सामान्य शब्द जोड़े गए हैं, जो (*) कोष्ठक में हैं। जहां कोई त्रुटी जैसे प्रतीत हो, मूल प्रकाशित वाङ्मय को ही आधार मानें।

पाठक अपने ‘अध्ययन’ के लिए मूल वाङ्मय - चार दर्शन, तीन वाद, तीन शास्त्र, संविधान को ही रखें।

पुस्तकों के प्रयुक्त संस्करण तथा चिन्ह की सूचना निम्नानुसार है। जहाँ अन्य किसी संस्करण का उपयोग किया गया, उसे यथा स्थान चिन्ह में दिया गया है।

पुस्तक का नाम

संस्करण

प्रयुक्त चिन्ह

मानव व्यवहार दर्शन

2010

व्य. द.

मानव कर्म दर्शन

2010

क. द.

मानव अभ्यास दर्शन

2010

अ. द.

समधानात्मक भौतिकवाद

2009, 1998

भ. व.

व्यवहारात्मक जनवाद

2009

ज. व.

अनुभवात्मक अध्यात्मवाद

2009, 2000

अ. व.

व्यवहारवादी समाजशास्त्र

2009

स.श.

आवर्तनशील अर्थशास्त्र

2009

अ. श.

मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान

2009

म्. वि.

संकलन जिम्मेदारी – श्रीराम नरसिंहन (विद्यार्थी), पुणे, २०२२, टायपिंग सहायता: मनोहर

सुधार संपर्क: books@divya-path.org

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