मानव की अभीप्साएं – “समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व” अभी भी प्रतीक्षा में ही हैं। इसको प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में और समग्र मानव में, निरीक्षण, परीक्षण और सर्वेक्षण पूर्वक स्वीकार के अर्थ में प्रमाणित कर भी सकता है, करा भी सकता है, करने के लिए प्रेरणा भी दे सकता है। इस विधि से यह स्पष्ट हो जाता है कि मानवाकाँक्षा सदा दर किनार रही है। कुछ लोगों ने आकाँक्षायें पैसा, पद, नाम फैलाने के ढंग से राज धर्म, शिक्षा व्यापार गद्दियों में आसीन होकर संसार को दिशा देने गये। ऐसे दिशा निर्देशन, विचार कार्यों के मूल में आदर्शवाद यथा अध्यात्म, अधिदैवी व अधिभौतिक विचार व प्रयास रहते आया। परिणाम में रहस्य ही हाथ लगा।
दूसरा भौतिकवाद विज्ञान के नाम से वंशानुषंगीय सापेक्ष व मात्रा विज्ञान अपने ही शोध के क्रम में अस्थिरता अनिश्चयता के दलदल में फंस गये। जहां तक सार्थक तकनीकी जितने भी हाथ लगी है, अधिकांश अक्रमिक घटनाओं के रूप में घटित हुए। शिक्षा प्रयोग विधि से लोक व्यापीकरण संपन्न हुआ है। म.वि. ९३-९४
इस धरती में सर्वप्रथम रहस्य मूलक ईश्वर केन्द्रित चिंतन ज्ञान को, विद्या माना गया। उसमें मूलत: रहस्य और रहस्यमय ईश्वर, इन दोनों प्रतिपादनों के कारण मतभेद बना रहा, फलत: विद्वानों को रहस्य मूलक ईश्वर, प्रमाण के रूप में हाथ नहीं लगा। उसके बाद यह भी प्रयास किया गया कि कोई देवी देवता हाथ लगे। उसके आधार पर रहस्य मूलक, देव केन्द्रित चिंतन ज्ञान को प्रस्तुत किया गया। वे देवी देवता भी रहस्य के चंगुल में फंसकर विद्वानों के हाथ नहीं लगे। फलत: सारे विद्वान व्यक्त-अव्यक्त ईश्वर अथवा देवी-देवताओं की बातें करते रहे, उपदेश देते रहे।
जहां जीने, करने की बात आती रही, वहां सामान्य भौतिकवादी जैसा जीता रहा, वैसा ही जीते, करते देखा गया। यही मूलत: आदि काल से बनी हुई विद्या, विद्वता कहलाती रही। विद्वानों की परस्परता में अंतर्विरोध रहता आया। यह लोक मानस में सुनिश्चित मार्ग, लक्ष्य व कार्य को निर्धारित नहीं कर पाया। इन्हीं कारणों से कुछ लोग आशा रखते हैं कि निर्धारण हो पायेगा, कुछ सोचते हैं कि निर्धारण नहीं हो पायेगा। - म.वि. 138–140
आदर्शवादी विचार के अनुसार, ईश्वर को रहस्यमय और सर्वशक्तिमान सृष्टि, स्थिति और लय कार्यों पर/में अधिकार रखने वाला माना गया है। यह मूलभूत मान्यता विविध प्रकार से दिखने वाली विविध धार्मिक मूल ग्रन्थों में प्रतिपादित किया गया। इनमें से अधिकांश रहस्यमयी ईश्वर केन्द्रित विचारों के अनुसार जीव और जगत का उत्पत्ति होना, स्थिति होना, लय होना माना गया। उनमें से कुछ विचार और दर्शन इस बात को भी स्वीकारता है, प्रतिपादन करता है जीवों के हृदय में ईश्वर जैसे ही वस्तु निहित या समाहित रहता है। जिसको आत्मा कहा गया है। कुछ लोग जीव का ही होना मानते हैं, कुछ लोग जीवों में आत्मा भी मानते हैं। ईश्वर कृपा पाने के लिये हर सम्प्रदाय में कार्य, विधि, कर्मकाण्ड