अध्याय 6: मानवीय परम्परा – अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था

परम्परा के तात्पर्य प्रवाहित होना है। प्रवाहित होने का तात्पर्य पीढ़ी से पीढ़ी में अंतरित होने, परीक्षण, निरीक्षण पूर्वक स्वीकृत होने और निष्ठापूर्वक हर पीढ़ी में प्रमाणित होने से है। यही परंपरा का तात्पर्य है। - अ.श. 244

6.1 प्रचलित समाज परिस्थिति

(i) वर्तमान शिक्षा परम्पराएं: समीक्षा

इस बीसवीं शताब्दी की दसवीं दशक तक व्यक्तिवादी समुदाय परम्परा में अभी तक की शिक्षा, संस्कार विधियों से, समुदायवादी अथवा व्यक्तिवादी प्रयासों की अपेक्षा में होते हुए भी, स्वतंत्रता और स्वराज्य रूपी ध्रुवों के आधार पर सफल होने का आधार, किसी परम्परा में करतलगत नहीं हुआ अर्थात् व्यवहार में प्रमाणित, शिक्षा में प्रबोधित नहीं हुआ। जिसके फलस्वरूप पुन: व्यक्तिवादी मानसिकता और समुदायवादी मानसिकता के लिए मानव विवश होते आया। इस प्रकार व्यक्तिवादी समुदाय परम्परा का स्वरूप स्पष्ट हो गया। सर्वमानव जागृति सहज विधि से इसे स्वतंत्रता और स्वराज्य पूर्वक, अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था, स्वानुशासन रूप चरित्र मूल्य, नैतिकता की मानसिकता का लोकव्यापीकरण सहित, प्रमाणित करने की आवश्यकता निर्मित हुई है। इसी क्रम में, अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन ज्ञान के आधार पर, यह “मानव-संचेतनावादी मनोविज्ञान’’ प्रणयित हुआ है। इसमें सम्बंधों को जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना प्रधान तत्व है।

यही मानव संचेतना का निश्चित स्वरूप है। जागृत मानव का सम्पूर्ण क्रम उक्त चार स्वरूप में व्याख्यायित है। ऐसी चार क्रियाएं प्रत्येक मनुष्य में, से, के लिए प्रमाणित होने का अध्ययन है। जैसे - माता की कोख में आई संतान, सर्वप्रथम मां को ही पहचानती है क्योंकि उनसे पोषण कार्य सम्पन्न होता हुआ, शैशव काल में ही, जीवन पहचान लेता है। फलस्वरूप मां को पहचानना संभव हो जाता है। उसी के साथ साथ संरक्षण कार्य, सूत्रित होना आरंभ होता है। शिशु के प्रति अपेक्षा माता पिता में यही बनी रहती है कि शिशु स्वस्थ रहे, खुश रहे, उत्सवित रहे। इसी प्रत्याशा को सफल बनाने के लिए, विविध प्रकार के उपायों को अनुसंधान करते और प्रयोग करते माता पिता को देखा गया है। जैसे ही शिशु काल से कौमार्य अवस्था समीचीन होती है वैसे ही जागृत मानव, जागृति व सम्बंधों को पहचानने, मूल्यों को निर्वाह करने के अर्थ में अभिभावक प्रेरक होना पाया जाता है। साथ ही आहार प्रणालियाँ ऐसी शिशु और कौमार्य अवस्था से ही स्वीकार होने लगती है।

भ्रमित परम्परा में रुढ़ियाँ व्यक्तिवादी, परिवार समुदाय क्रम में रुढ़ियाँ (सामुदायिक, पारिवारिक, व्यक्तिगत रुढ़ियाँ) क्रम से, कौमार्य अवस्था की मानव संतान को प्रभावित कर लेती हैं। इस कौमार्य अवस्था के पहले से ही, भ्रमित समुदायों, परिवारों में अभ्यस्त विधि से आहार प्रणाली (चाहे वह शाकाहार, दुग्धपान हो, चाहे मांसाहार, मद्यपान हो) के अभ्यस्त हो जाते हैं।

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