ये सब मोक्ष के सम्बन्ध में बताए गए उपायों के क्रम में इंगित कराया गया। इंगित कराने का तात्पर्य स्वीकारने योग्य तरीके से है। और भी कुछ प्रणेता लोगों का कहना है कि प्रलय काल में परिणाम मोक्ष के रूप में जीव-जगत, ‘वह’ में विलय हो जाता है (‘वह’ का तात्पर्य ऊपर कहे गये अध्यात्म, ईश्वर, देवी, देवताएँ)। सबका कल्याण करेगा तब तक ईश्वरीय नियमों के साथ-साथ जीना ही धर्म संविधान है। ऐसा बताया करते हैं।
जहाँ तक स्वर्ग की बात है इसे, इस धरती से भिन्न स्थली में संजोने का वाङ्मयों में प्रयत्न किया। उन-उन लोक में कोई देवी-देवता का होना और उन्हीं के आधिपत्य में उनका सौन्दर्य और सुख रहने का विधि से बताया गया है। इन वाङ्मयों में स्वर्ग को सर्वाधिक सम्मोहनात्मक और आकर्षक विधियों से सजा हुआ बताया गया है वहाँ पहुँचने के लिए जो ज्ञात स्थिति है वह पुण्य ही एक मात्र पूंजी बताई गई है। पुण्य को पाने के लिए स्वार्थी को परमार्थी होना आवश्यक बताया। अतिभोग-बहुभोगशीलता गलत है। इसी के साथ-साथ स्वर्ग की अर्हता को पूरा करने के लिए त्याग का उपदेश दिया गया। ज्यादा से ज्यादा सुख-सुविधावादी वस्तुओं का दान योग्य पात्रों को करने से स्वर्ग में अनंत गुणा सुख सुविधाएं मिलने का आश्वासन किताबों में लिखा गया। ध्यान, स्मरण, कृत्यों को पुण्य कमाने का स्त्रोत बताया गया। इसी के साथ-साथ अवतारी आचार्य, गुरू, सिद्घ, आश्वासन देने में समर्थ व्यक्तियों का सेवा-शुश्रूषा, उनके लिए अर्पित दान, स्तुति, कीर्तन ये सब पुण्य कमाने का विधि बताए। इसी के साथ-साथ परोपकार, जीव, जानवर, पशु पक्षियों के साथ प्रेम, फूल-पत्ती, पेड़ के साथ दया करने को भी कहा। साथ ही मन को धोने और स्थिर करने की बातें बहुत-बहुत कही गयी हैं। इन सभी उपदेशों का भरमार रहते हुए भी भय, प्रलोभन और आस्थावादी कृत्यों से अधिक मानव परंपरा में इस समूची धरती में और कुछ होना देखने को नहीं मिला। अर्थात् उपदेश के रूप में जो बातें कहते आये हैं उसके अनुरूप कोई प्रमाण होता हुआ देखने को नहीं मिला। इसी समीक्षा के आधार पर ही ‘‘अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’’ की परमावश्यकता को स्वीकारा गया।
दूसरे विधा से मानव सहज कल्पनाशीलता, कर्मस्वतंत्रता के आधार पर विचारों का उन्नयन हुआ, जिसको हम भौतिकवादी विचार कह रहे हैं। सम्पूर्ण कल्याण का आधार सुख-सुविधा और स्वर्ग का स्वरूप भौतिक वस्तु ही होना बताया गया। इसे अधिकांश लोकमानस में स्वीकारा भी गया। इस प्रकार अदृश्य के प्रति आस्थान्वित होना, दूसरे विधि से जो दृश्यमान वस्तुएँ है उसी को सम्पूर्ण सुख-सुविधा का आधार या विकास का आधार मान लेना देखा गया। भौतिकवाद भय और प्रलोभन के बीच झूलता हुआ संघर्षशील, संघर्षमय मानसिकता को तैयार करता हुआ देखा गया। भौतिकवाद का सार बात समीक्षा के रूप में यही मिलता है कि संघर्ष के लिए तैयार रहना परमाणु, अणु और अणु रचित पिण्डों का कार्यकलाप है। उसी क्रम में मानव भी एक रासायनिक-भौतिक वस्तुओं से रचित पिण्ड है। इनको सर्वाधिक संघर्ष करने का हक है।
इसका प्रयोग करना ही प्रगति और विकास बताया गया है। यह भय, प्रलोभन निग्रह बिन्दुओं में फँसा हुआ आस्थाओं से टूटकर स्वर्ग में मिलने वाला सभी चीजें यहीं मिलने का संभावना बना। उसके लिए आवश्यकीय संघर्ष को जैसा-जैसा भौतिकवादी शिक्षा में शिक्षित हुए वैसे-वैसे अनेक तरीकों सहित संघर्ष करने के लिए प्रवृत्तियाँ बुलंद होते ही आया, अर्थात् बढ़ता ही आया। जबकि हर मानव भय और प्रलोभन रूपी भ्रमवश ही संघर्ष करता है।