इसी विधि से यह भी हम पाते हैं अस्तित्व में प्रत्येक एक अपने ‘त्व’ सहित व्यवस्था के रूप में होना सत्य है। इन्हीं दो (परम सत्य और सत्य) तथ्यों के आधार पर प्रत्येक एक का लक्ष्य आचरण और प्रमाण ही केवल व्यवस्था सहज आधार होना पाया जाता है। इस नजरिया से मानव मानवत्व सहित जीने की कला क्रम में, दूसरे भाषा से मानवत्व सहित प्रमाणित होने के क्रम में, सत्य को समझना परमावश्यक रहा है यही जागृति सहज प्रमाण हैं। अस्तित्व न तो रहस्य है न ही दुरुह-जटिल है। अस्तित्व को ‘सत्ता में संपृक्त प्रकृति’ के रूप में हर व्यक्ति समझने योग्य है और अस्तित्व ही सह-अस्तित्व होने के कारण पदार्थ, प्राण-जीव अवस्था के साथ-साथ ज्ञानावस्था में स्वयं को पहचान पाना सहज है। सह-अस्तित्व में ही व्यवस्था सर्वत्र-सर्वदा वैभवित है। -अ.श, 132-133

1.3 विकल्प – अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन

(*जैसे पूर्व में वर्णित किया गया) मानव सहज रूप में, निरंतर अनुसंधान शोध और प्रयास करते आया। मानव परम्परा में सुदूर विगत से दो अनुसंधान प्रधान है। एक अनुसंधान है, रहस्यमयी ईश्वर केन्द्रित चिंतन प्रणाली, जिसका मूल आशय यह है कि “ईश्वर से सब कुछ होता है।’’ इसका लोकव्यापीकरण शिक्षा के माध्यम से सम्पन्न किया गया। दूसरा अनुसंधान, अस्थिरता मूलक, वस्तु केन्द्रित चिंतन। इसका आशय है, “वस्तु से सब कुछ होना’’। वस्तु केन्द्रित चिंतन का भी लोकव्यापीकरण शिक्षा के माध्यम से संपन्न हुआ है। तीसरी विधि से किसी देवी, देवता, दिव्य पुरुष से अथवा मूर्ति से सब कुछ होता है। इसका भी यथाविधि अनुसंधान हुआ। वाङ्मय बना। प्रकारान्तर से इसका भी लोकव्यापीकरण हुआ। इनको क्रम से (१) ईश्वरवाद बनाम अध्यात्मवाद। (२) भौतिकवाद बनाम द्वंद्ववाद। और (३) देववाद बनाम अधिदैवीवाद नाम दिया गया है। इनमें प्रमाण विधियों के लिए आदमी तरसा एवं तरने, तारने का प्रयास किया। इन तीनों प्रकार के अनुसंधानों में शब्द को प्रमाण माना गया। मानव, ईश्वरीय व अध्यात्म और देवी व आदर्शों को मानते हैं।

पहली विधि से अध्यात्म, अतिगहन आदर्श है, मौन है, निर्विशेष है और आचरण के रूप में विरक्तिवादी (साधन चतुष्टय सम्पन्नता) है। तृतीय प्रकार के चिंतन का आदर्श, उन उन देवी देवताओं के नाम से प्राप्त वाङ्मय का उच्चारण सहित, ऐतिहासिक स्मृतियों अथवा कल्पित स्मृतियों से, चित्रित रूप में जो व्यक्त रहते हैं, उनको आदर्श पुरुष, आदर्श चरित्र, आदर्श ज्ञान और दर्शन मानते हैं। यह परम्परागत के रूप में, भक्ति के रूप में आया रहता है। ऐसे आकार प्रकार के स्मारक और स्मारक स्थलियों को आदर्श स्थान मानना कार्यक्रम है। इन दोनों, प्रथम और तृतीय चिंतन के अनुसार, और एक साम्यता है कि सामान्य व्यक्तियों को स्वार्थी, अज्ञानी और पापी के रूप में निरुपित करना और उससे मुक्ति दिलाने के लिए प्रकारान्तर से दिया गया आदर्शात्मक दर्शन, आदर्शात्मक ज्ञान के आधार पर, कार्यक्रम प्रस्तुत करना। इसी के साथ उपासना और उपासना के कर्मकाण्डों का भी लोकव्यापीकरण करने की प्रक्रिया सम्पन्न होते आई। द्वितीय प्रकार (भौतिकवाद) के अनुसंधानों का प्रमाण, यंत्रों के रूप में प्रस्तुत हुआ।

“सब कुछ होने’’ के तात्पर्य में, ध्रुवीकृत बिंदू यही है कि मानव कितने ही प्रश्न और जिज्ञासा करता है, उन सबका उत्तर मिल जाय और व्यवहार में प्रमाणित हो जाय। देखने को यही मिल रहा है कि जितने भी जिज्ञासा और प्रश्नों को समाधानित करने के प्रयास हुए, उसके उपरान्त भी, प्रश्न चिन्हों की संख्याएं बढ़ती गई। आदर्शवादी चिंतन, जनमानस में आस्था के रूप में (अर्थात् नहीं जानते हुए भी मानने के रूप में) है। इस प्रकार आस्थाओं में विविधता हुई। न जानते हुए मानने के आधार पर अंतर्विरोध हुआ, यही प्रश्नों की स्थली है। द्वितीय प्रकार के अनुसंधान (*भौतिकवाद) यंत्र

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