मनोनिरोध, दृष्टाविधि के लिये जो कुछ भी उपदेश है उसी के आधार पर प्रयत्न और अभ्यास किया गया। निर्विचार स्थिति को प्राप्त करने के बाद परंपरा जिसको समाधि, निदिध्यासन, पूर्णबोध निर्वाण कुछ भी नाम लिया है, इसी स्थली में मूल शंका का उत्तर नहीं मिल पाया। परिणामत: इसके विकल्प के लिये तत्पर हुए। पूर्ववर्ती इशारों के अनुसार ‘संयम’ का एक ध्वनि थी।
उस ध्वनि को संयम में तत्परता को बनाया गया। आकाश (शून्य) में संयम किया। निर्विचार स्थिति में अस्तित्व स्वीकार/बोध सहित सभी ओर वस्तु सब आकाश में समायी हुई वस्तु दिखती रही इसलिये आकाश में संयम करने की तत्परता बनी। कुछ समय के उपरान्त ही अस्तित्व सह-अस्तित्व रूप में यथावत् देखने को मिला। अस्तित्व में ही ‘जीवन’ को देखा गया। अस्तित्व में अनुभूत होकर जागृत हुए। ऐसे अनुभव के पश्चात् अस्तित्व सहज विधि से ही हर व्यक्ति अनुभव योग्य होना देखा गया। अनुभव करने वाले वस्तु को ‘जीवन’ रूप में देखा गया। इसी आधार पर ‘‘अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’’ को प्रस्तुत करने में सत्य सहज प्रवृत्ति उद्गमित हुई। यह मानव सम्मुख प्रस्तुत है। – आ.व. 179
(*अब तक) मानव के बहुआयामी इतिहास में उन सभी आयामों के लिए पूरक होने के प्रमाण को मानव अपने कुल के लिए समर्पित नहीं कर पाया। इसी कारण अब प्रबुद्घ मानवों का यह दायित्व होता है कि सभी आयामों में जो रिक्त और अपेक्षित भाग है उसकी भरपाई कर देवें। उसमें से प्रथम और प्रमुख आयाम यही देखने को मिला-व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी। मानव जागृतिपूर्वक ही इसकी भरपाई कर पायेगा।
‘जागृति’ मानव की सर्वकालीन अपेक्षा और आवश्यकता है। अभी यह इस प्रकार से संभव हो गया कि-
अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित दर्शन विधि से मानव ही चिंतनशील एक मात्र इकाई है। चिंतन का मूल तत्व अथवा मूल वैभव जीवन सहज रूप में होने वाले जानने, मानने के रूप में और उसके तृप्ति बिंदु के रूप में है। - भ.व. 122
मानव अभी तक जितने भी समुदाय परंपरा में अपने को पहचानता है, इन सबका एक ही 'अभिशाप’ रहा है कि अस्तित्व में अपने को अविभाज्य रूप में समग्रता के साथ दर्शन नहीं कर पाना। दूसरा अभिशाप स्वयं को पहचानने की इच्छा रहते हुए भी अपूर्ण रह जाना इसका स्पष्ट स्वरूप यही है कि सच्चाई को पहचानने की गवाही नहीं दे पाना। - भ.व. –249
(*जागृत मानव के) विचार के मूल में ही अनुभव रूपी दर्शन का महिमा देखा गया है जिसको इंगित करने के लिए, हृदयंगम करने के लिए मध्यस्थ दर्शन सहज रूप में ही मध्यस्थ सत्ता, मध्यस्थ क्रिया, मध्यस्थ जीवन का प्रतिपादन के रूप में व्यवहार, कर्म, अभ्यास और अनुभव दर्शन के रूप में समीचीन हुई अर्थात् उपलब्ध हो गई है। इस प्रकार परम सत्य को जानने-मानने के लिए दर्शन, उसे तर्कसंगत अर्थात् -विज्ञान सम्मत विवेक, विवेक सम्मत विज्ञान विधि से संप्रेषित करने के लिए विचार, सत्यमयता को तर्कसंगत विचार प्रणाली पूर्वक व्यवहार विधा में अर्थात् परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में प्रमाणित करने के क्रम में शास्त्रों का होना मानव परंपरा सहज आकांक्षा, आवश्यकता और उपलब्धियाँ हैं। इस प्रकार परम सत्य रूप में सह-अस्तित्व है। अस्तित्व में मानव भी एक अविभाज्य इकाई है।