(अवधारणापूर्वक) प्रवर्तनशील होने से अथवा प्रवर्तित होने से है। यही मानवीय संस्कृति-सभ्यता-विधि-व्यवस्था के रूप में सहज अभिव्यक्ति-संप्रेषणा-प्रकाशन है।
मानवीयतापूर्ण मानव ही परिवार मानव पूर्ण स्वत्व स्वतंत्रता अधिकारपूर्वक स्वयं स्फूर्त विधि से परिवार में समाहित जितने भी सदस्य या मानव होते हैं (स्त्री-पुरुष-आबाल-वृद्घ) उनके परस्परता में सम्बन्धों को पहचानते हैं, संबोधनपूर्वक मूल्यों का निर्वाह करते हैं। साथ ही दोनों मूल्यांकन करते हैं, उभय तृप्ति का अनुभव करते हैं। यही विश्वास के नाम से जाना जाता है। सुख, शांति, संतोष, आनंद का नाम ही विश्वास है। यह विश्वास परस्परता में होना स्पष्ट है। ऐसी परस्परताएं नैसर्गिक पर्यावरण मानवकृत वातावरण जैसा - मानवीय शिक्षा-संस्कार, परिवार मूलक मानवीय आचार संहिता रूपी स्वराज्य, व्यवस्था, संविधान और मूल्यमूलक, लक्ष्यमूलक प्रभेदों में प्रवर्तन के आधार पर मानव का व्यवस्थापूर्वक सुखी होना स्पष्ट है
लक्ष्य मूलक | मूल्य मूलक एवं लक्ष्य मूलक |
जागृति पूर्णता पूर्वक परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था प्रेरकता सहित निर्वाह क्रिया | जागृति सहित सहज मूल्यों के आस्वादन के आधार पर चयन आस्वादन |
ऊपर किये गये चित्रण से रुचिमूलक विधि से असामाजिक होना समीक्षित होता है। मूल्य मूलक एवं लक्ष्य मूलक विधि से व्यवस्था में सार्वभौमता और व्यवस्था में भागीदारी की सार्वभौमता दृष्टव्य है।
जागृत मानव परंपरा में अध्ययन पूर्वक शिक्षा संस्कार-होना देखा गया। जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान विधिवत् अध्ययनपूर्वक बोधगम्य होना हो पाता है। इसको अभिव्यक्ति, संप्रेषणा क्रम में प्रामाणिकता और प्रमाण होना पाया जाता है। इसी विधि से यह सुस्पष्ट है कि उक्त परम ज्ञान-परम दर्शन के आधार पर सह-अस्तित्ववादी विचार शैली, शास्त्र बोध होना और साक्षात्कार होना स्वाभाविक है। बोध और साक्षात्कार के क्रम में नित्य आचरण पूर्वक पुष्टि, अनुभवमूलक प्रणाली से नित्य स्रोत बनाए रखना, इसे प्रत्येक मानव अनुभव कर सकता है। मानव अपने में सुखी होने के क्रम में सर्वतोमुखी समाधान की आवश्यकता और अनिवार्यता स्पष्ट हो जाती है। यही सह-अस्तित्वपूर्वक सुखी होने का रास्ता है। इस क्रम में मानव में स्वायत्तता परिवार और विश्व परिवार में प्रमाणित हो पाता है। इसी विधि से समाज रचना और परिवारमूलक स्वराज्य व्यवस्था अविभाज्य रूप में प्रमाणित होता है। - अ.श. 202-213
(*अर्थात्) जागृतिपूर्वक ही मानव सुखी होता है। हर मानव सुखी होना चाहता भी है। जागृत होने की संभावना सदा बना रहता है। मानव परंपरा अभी तक जागृति क्रम में होने के कारण आदर्शों को मानते हुए और जागृति की अपेक्षा को बलवती बनाता ही आया। इसी क्रम में जागृति पद तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्ति का पृष्ठभूमि होना मूल्यांकित होता है। पुनःश्च जागृति क्रम और जागृति पद में पहुँचने का पृष्ठ भूमि है। इस क्रम में जागृति की इच्छा सर्वाधिक बलवती होने की आवश्यकता रहते आया। इसी क्रम में आज स्थिति ऐसी बनी है सर्वाधिक संख्या में मानव जागृत होना