समाधानात्मक भौतिकवाद
शिक्षा में अथवा शिक्षा विधि में जीवन ज्ञान, सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान सम्पन्न शिक्षा रहेगी ही। इसे पाने के लिए समाधानात्मक भैतिकवाद का अध्ययन कराया जाता है। जिससे संपूर्ण भौतिकता रसायन तंत्र में व्यक्त होते हुए संयुक्त रूप में विकास क्रम को सुस्पष्ट किये जाने का तौर तरीका और पूरकता रूपी प्रयोजनों का बोध कराया जाता है। समाधानात्मक भौतिकवाद परमाणु में विकास, परमाणु में प्रजातियां होने का अध्ययन पूरा कराता है। परमाणु विकसित होकर जीवन पद में संक्रमित होता है दूसरी भाषा में विकसित परमाणु ही जीवन है। हर भौतिक परमाणु में श्रम, गति, परिणाम का होना समझ में आता है। जबकि गठनपूर्ण परमाणु (चैतन्य इकाई) परिणाम प्रवृत्ति से मुक्त होता है। दूसरी भाषा में जीवन परमाणु परिणाम के अमरत्व पद में होना पाया जाता है। अमरत्व की परिकल्पना प्राचीन काल से ही देवताओं को अमर, आत्मा को अमर कहना यह आदर्शवाद है। यह मन में रहते आयी है। इसे चिन्हित रूप में सार्थकता के अर्थ में अध्ययन करना कराना संभव नहीं हुआ था। सहअस्तित्व विधि से यह संभव हो गया। इस क्रम में जीवन के सम्पूर्ण क्रियाकलापों जैसे जीवन में जागृति, जागृति क्रम में जागृति एवं जीवन का अमरत्व का अध्ययन भली प्रकार से हो पाता है। जागृति में समाधान का उदय होने पर समाधानात्मक भौतिकवाद की सार्थकता समझ में आती है। भौतिकवाद को संघर्ष का आधार माना जाये या समाधान का। इस पर संवाद एक अच्छा कार्यक्रम है।
व्यवहारात्मक जनवाद
मानवीय शिक्षा में व्यवहारात्मक जनवाद प्रस्तुत हुआ है। इसका प्रयोजन मानव अपने परस्परता में व्यवहार न्याय प्रमाणित करने के लिए चर्चा, परिचर्चा प्रमाणात्मक प्रस्तावात्मक वार्तालाप। मूल्य मूलक, लक्ष्य मूलक, जीने का महत्व, मूल्यों का मूल्यांकन करने सम्बन्धों को पहचानने और निर्वाह करने, मानवीय संस्कार, मानवीय व्यवहार पूर्वक जीने, मानवीय आचरण में जीने, परिवार मूलक राज्य व्यवस्था में जीने, आवश्यकता से अधिक उत्पादन संयम पूर्ण विधि से स्वास्थ्य को बनाए रखने, श्रम नियोजन श्रम विमिनय के आधार पर विनिमय कोष व्यवस्था पूर्वक जीने, न्याय- प्रदायी क्षमता सम्पन्नता पूर्वक जीने, सही रूप में उत्पादन कार्य करते हुए जीने, नियम न्याय समाधान समृद्धि प्रामाणिकता पूर्ण पद्धति, प्रणाली, नीति पूर्वक जीने की कला का वर्तमान और उसकी निरतंरता। इंगित सभी मुद्दो में सकारात्मक पक्ष को स्वीकारना है ऐसी मान्यता हमारी है। प.स. 180
अनुभवात्मक अध्यात्मवाद
मानवीय शिक्षा में अनुभवात्मक अध्यात्मवाद को अध्ययन कराया जाता है जिसमें अध्यात्म नाम की वस्तु को साम्य ऊर्जा के रूप में जानने, मानने, पहचानने की व्यवस्था है। सम्पूर्ण प्रकृति, दूसरी भाषा में सम्पूर्ण एक एक वस्तुएँ, तीसरी भाषा में जड़-चैतन्य प्रकृति, चौथी भाषा में भौतिक, रासायनिक और जीवन कार्यकलाप व्यापक वस्तु में सम्पृक्त विधि से नित्य क्रियाकलाप के रूप में वर्तमान है। इसे बोधगम्य कराते हैं यही सहअस्तित्व का मूल स्वरूप है। इस मुददे को बोध कराना बन जाता है। बोध को प्रमाणित करने के क्रम में अनुभव होना सुस्पष्ट हो जाता है। जिससे