अनिवार्यता में बदल चुकी है। क्योंकि जागृति पूर्वक ही व्यवस्था में जीना बन पाता है। व्यवस्था में भागीदारी स्वयंस्फूर्त विधि से स्पष्ट हो जाता है, सार्थक होता है। - स.श. 104–105
अभी हम मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद को पाकर अर्थात् सहअस्तित्ववादी नजरिया से सोच, विचार, निश्चयन, सुनिश्चयन के आधार पर जीना शुरू किये हैं। इससे पता चला मानव लक्ष्य मूलक विधि से सुरक्षित रहता है। सुरक्षा का अनुभव करता है क्योंकि भौतिकवाद के अनुसार रूचिमूलक विधि से सुरक्षा को पाना चाहते रहे और आदर्शवाद के अनुसार भक्ति विरक्ति को सुरक्षा का कवच मानते रहे इन दोनों विधि से प्रमाणित होना बना नहीं। सहअस्तित्ववादी नजरिये से सफल होना बन गया। क्योंकि मूल्यों के आधार पर लक्ष्य के अर्थ में जितने भी सोच विचार और समझ अपने आप में समाधान होना पाया जाता है। इसी तथ्य के आधार पर तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग सुरक्षा करना बन पड़ता है। इसका स्पष्ट झाँकी यही रहा तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग स्वयं सुरक्षित होने का अनुभव करा देता है। अर्थ अपने में उक्त प्रकार से मानव के साथ वर्तमान रहता है। अर्थ का स्वरूप मन रूप में समाधान, तन रूप में क्रियाशीलता और व्यवहार, धन रूप में आहार, आवास, अलंकार, दूरदर्शन, दूरगमन, दूरश्रवण सम्बंधी वस्तुएँ और उपकरण। इन सब का सदुपयोग हो जाना अर्थ का सुरक्षा है। सदुपयोगिता का स्वरूप, शरीर पोषण संरक्षण समाज गति के रूप में देखा गया है। मानव अपने में सुरक्षित होने का अनुभव तभी कर पायेगा जब तन, मन, धन रूपी अर्थ को जब सदुपयोग कर पायेगा। उक्त तीनों प्रकार के अर्थ मानव ही परस्परता में उपयोग करता हुआ देखने को मिलता है। मानव अपने में सुरक्षा की चाहत को सदा से बनाए रखा किन्तु सुरक्षा के साथ होने का जो प्रमाण है वह दूर रह गया। हम ज्यादा से ज्यादा चाहत को ज्ञान मानकर चलते रहे। जबकि होना रहना ही ज्ञान का प्रमाण है यह तो सुनिश्चित हो गया है। सहअस्तित्ववादी मानसिकता पूर्वक ही समाधान और सुरक्षा पाकर सुख, शान्ति का अनुभव कर पाता है। इस तथ्य को भली प्रकार से हम जीकर देखे हैं। यह सार्थक हो जाता है। - ज.व. 142