पूर्वक देखने को मिलता है। अतएव सच्चाई को तलाशने के क्रम में मैं अपने को एक मानव की हैसियत से ही मूल्यांकित कर पाया। इसी आधार पर तलाश प्रारंभ हुई। मैंने अपने में यह पाया कि मुझमें समझने की अर्हता (क्षमता, योग्यता, पात्रता को प्रमाणित करने योग्य) समाई हुई है। चिंतनपूर्वक समझने के आधार पर उद्देश्य पूर्ति के लिए अपनी इस विचारशैली को पहचानने लगा। क्रमशः मैंने अपने जीवन में सहअस्तित्व को साक्षात्कार किया, अनुभव किया। उन्हीं क्रियाकलापों का नाम जीवन अथवा मानसिकता के रूप में विचारशैली नाम दिया। ऐसी विचारशैली जो मानव लक्ष्य को सार्थक बनाने के लिए तत्पर है। ऐसे एक सौ बाइस (122) रूपों में आंकलन किया, उसको क्रमशः संप्रेषित किया। इसमें मुख्य यही प्रणाली चरितार्थ होने के लिए मुझे मिली कि मानवीयतापूर्ण आचरण को मैं प्रमाणित कर पाया। मानवीयतापूर्ण आचरण अपने स्वरूप में मूल्य, चरित्र, नैतिकता के संयुक्त रूप में मिला। इससे इस मानवीयतापूर्ण आचरण सहित मेरा बहुत से ज्ञात अज्ञात व्यक्तियों के साथ विश्वास पूर्वक जीना संभव हो गया।
यह सर्व विदित तथ्य है कि विश्वास पूर्वक जीना बन जाता है, उसके फलन में व्यक्ति सुखी होता है यह भी मुझे समझ में आया। विश्वास एवं सुख की अपेक्षा सभी मानवों में विद्यमान है ही। अस्तु मानव कुल के लिए यह मनोविज्ञान साहित्य स्वयं विश्वास पूर्वक जीने, परिवार में जीने, समाज में जीने और व्यवस्था में जीने के लिए निश्चित दिशा के लिए प्रेरक होगा। यही मेरी कामना है। “मानव है तो मानवीयता है ही।”