परंपराओं में प्रतिपादित रही हैं। जिसमें से पाप और नरक के प्रति भय; पुण्य और स्वर्ग के प्रति प्रलोभन रहा तथा इन दोनों से मुक्ति ही सर्वश्रेष्ठ स्थिति बताई जाती है। प्राय: सभी प्रकार के धर्म ग्रंथों में इस प्रकार की मानसिकता को देखा जा सकता है।

इस प्रकार रहस्यमय ईश्वर केंद्रित चिंतन ज्ञान लोक मानस पर भय, प्रलोभन और घृणा के रूप में अपना प्रभाव डालते आया। इससे स्पष्ट हो जाता है कि पहले से ही लाभ, द्वेष, संग्रह-शोषण की बात मानव मानस में बढ़ती आयी है।

भौतिकवादी चिंतन के उपरांत जिस कामोन्मादी मनोविज्ञान का विश्लेषण अध्ययनगम्य हुआ उससे पहले से रहा आया भय तथा प्रलोभन और अधिक प्रभावशील हुआ यह एक प्रक्रिया सहज परिणाम रहा। इन दोनों परिणामों में भोगोन्माद होना एक अनिवार्य किन्तु अवांछनीय घटना रहा। यह घटना बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में अधिकांश लोगों को विदित हो चुकी है। इनके सम्मिलित प्रभावों के आधार पर अथवा अलग-अलग प्रभाव पर मानव का आचरण सहज निश्चयन होना संभव नहीं हुआ। इसके विपरीत प्रकारान्तर से इसकी चाहत (मानवीयता पूर्ण आचरण की अपेक्षा) बनी ही रही। इस प्रकार मानव का पुनः विचार और अध्ययन होना आवश्यकता बन गई। इस क्रम में रहस्यमय ईश्वरवादी चिंतन के आधार पर मानव सहज जितनी भी परिकल्पनाएँ हुई वे विविध देश, विविध काल और भौगोलिक परिस्थितियों में मानव जीवन, जागृति क्रम और जीवन के कार्यक्रम को अध्ययनगम्य कराने में असफल रही हैं। भक्ति व विरक्ति विधि से भी सार्वभौम रूप में लोकव्यापीकरण प्रभावित नहीं हो पाया। इसी प्रकार अस्थिरता अनिश्चयता मूलक वस्तु केन्द्रित चिंतन ज्ञान के आधार पर मानव जीवन जीवनी क्रम, जीवन के निश्चित कार्यक्रम का अध्ययन नहीं हुआ। इसलिए निश्चयात्मक मानवीयता पूर्ण आचरण की परिकल्पना, अध्ययन और प्रमाण तथा इसे व्यवहारिक प्रयोजन के साथ बोधगम्य करा देना ही “मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान” का अभिप्रेत मुद्दा है।

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