सहित जागृति क्रम का प्रमाण होना पाया जाता है।” जागृत मानव के लिए ही प्रमाणित होना वांछनीय है। प्रमाणित होने के क्रम में अभी तक सार्वभौम व्यवस्था, अखंड समाज की अपेक्षा बनी रही है यह अभी भी अपेक्षित है।
भय, प्रलोभन, आस्था के अनंतर न्याय, समाधान और प्रामाणिकता प्रकारान्तर से सभी मानवों में अपेक्षित है। अपेक्षाएँ मानव में कर्म स्वतंत्रता कल्पनाशीलतावश ही बहती हुई देखने को मिलती हैं। यही मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान का अनुसंधान क्रम सूत्र है।
अस्तित्व में, से, के लिए “स्थिति सत्य”, “वस्तु स्थिति सत्य” तथा “वस्तुगत सत्य” ही न्याय, समाधान, सत्य का अध्ययन है। “स्थिति सत्य” सम्पूर्ण अस्तित्व ही है। अस्तित्व स्वयं सत्ता में संपृक्त प्रकृति है। प्रकृति अस्तित्व में विभक्त अर्थात् एक-एक रूप में दिखाई पड़ती है और अस्तित्व में सत्तामयता कितनी लम्बाई चौड़ाई में फैली है यह मानव में, से, के लिए एक आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत नहीं हो पाता। दूसरी विधि से यह कितना लम्बा चौड़ा है इसको मानव नाप नहीं सकता। इसके साथ यह भी देखने को मिला है कि “मानव आवश्यकता सहित सम्पूर्ण प्रकार के प्रर्वतन में आरुढ़ होता है।” अतएव सत्तामयता सहज लम्बाई चौड़ाई का नाप नहीं हो पाने के कारण ही इसे व्यापक कहा गया है। साथ में सत्तामयता सर्वत्र सर्वदा एक ही स्वरूप में विद्यमान वर्तमान होने के कारण इसे व्यापक कहना सार्थक सिद्ध होता है। ऐसी व्यापक सत्ता में अनंत प्रकृति सहज इकाईयाँ अर्थात् विभक्त इकाईयाँ होना देखा जाता है। विभक्त होने का तात्पर्य एक-एक के रूप में अंगुली न्यास करने = (देखने, दिखाने) के अर्थ में सार्थक है। खूबी यही है कि सत्ता में ही सम्पूर्ण इकाईयाँ डूबी हुई, भीगी हुई, घिरी हुई होना पाया जाता है। ऐसी सत्तामयता को शून्य, ज्ञान, परमात्मा आदि नामों से भी इंगित कराया जाता है। सत्तामयता का तात्पर्य है सम्पूर्ण प्रकृति का, अपनी-अपनी अवस्था में कार्य करने के लिए ऊर्जा सम्पन्न रहना।
इस प्रकार सम्पूर्ण प्रकृति में, से, के लिए सत्तामयता ऊर्जा के रूप में प्रमाणित है। सत्तामयता का सम्पूर्ण अवस्थाओं में पाई जाने वाली प्रकृति में पारगामी होना ही मुख्य रूप में ऊर्जा का स्वरूप है। इसका परीक्षण एवं प्रमाण हर छोटे से छोटे अंश जैसे परमाणु परमाणु में निहित एक-एक अंश और उसको यदि विभाजित करें - ऐसे हरेक भाग का गतिशील होना पाया जाता है। इससे सहज पता चलता है कि सम्पूर्ण प्रकृति ऊर्जा में भीगी हुई है। यही सत्तामयता के पारगामी होने का प्रमाण है। सत्तामयता में सम्पूर्ण प्रकृति और सम्पूर्ण प्रकृति में सत्तामयता ओतप्रोत रूप में है